5 जून को आने वाला आरबीआई (RBI) की पॉलिसी का फैसला आपकी ईएमआई (EMI), बैंक डिपॉजिट और डेट फंड्स की दिशा तय करेगा। अप्रैल की समीक्षा के बाद फिलहाल रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर बरकरार है और आरबीआई का रुख न्यूट्रल बना हुआ है। नए बेस के आधार पर अप्रैल में रिटेल महंगाई घटकर 3.48 प्रतिशत पर आ गई है, लेकिन थोक महंगाई का 8.3 प्रतिशत पर पहुंचना दबाव के संकेत दे रहा है। इन्हीं मिले-जुले आंकड़ों के बीच कल का बड़ा फैसला लिया जाना है।
ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा (status quo), लेकिन आरबीआई की कमेंट्री और भविष्य के संकेत आंकड़ों से कहीं ज्यादा अहम होंगे। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 3 जून से 5 जून तक चली, जिसका फैसला शुक्रवार को सुनाया जाएगा। बाजार की नजर महंगाई के अनुमान, लिक्विडिटी के संकेतों और कच्चे तेल की कीमतों पर रहेगी। अगर आरबीआई का रुख सख्त (hawkish) रहा तो बॉन्ड यील्ड बढ़ सकती है, वहीं नरम रुख (dovish) से बाजार को स्थिरता मिल सकती है।

RBI पॉलिसी: आपकी EMI और FD पर क्या होगा असर?
एक्सटर्नल बेंचमार्क से जुड़े होम लोन सीधे तौर पर रेपो रेट के हिसाब से चलते हैं। अगर रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट का बदलाव होता है, तो 20 साल के लोन पर प्रति लाख करीब 16 रुपये की ईएमआई बदल जाती है। अगर दरें स्थिर रहती हैं, तो लोन की अवधि (tenure) घटाने के लिए छोटे-छोटे प्री-पेमेंट करने पर विचार करें। अगर बैंक रिस्क प्रीमियम बढ़ाते हैं, तो दूसरे बैंकों के रेट्स की तुलना करें या रिफाइनेंस कराएं। बचत करने वालों के लिए सलाह है कि एक साथ बड़ी एफडी कराने के बजाय अलग-अलग मैच्योरिटी वाली एफडी (laddering) चुनें।
RBI पॉलिसी: डेट फंड्स, SIP स्ट्रैटेजी और मार्केट के संकेत
ब्याज दरों में बदलाव न होने पर भी बॉन्ड फंड्स आरबीआई के संकेतों पर प्रतिक्रिया देते हैं। लॉन्ग-ड्यूरेशन और गिल्ट फंड्स पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है, जबकि शॉर्ट-ड्यूरेशन और मनी मार्केट फंड्स में कम हलचल होती है। अगर थोक महंगाई या तेल की कीमतों को लेकर आरबीआई का रुख सख्त होता है, तो ड्यूरेशन कम करना बेहतर होगा। अगर महंगाई का अनुमान लक्ष्य के करीब रहता है, तो टारगेट-ड्यूरेशन फंड्स में धीरे-धीरे निवेश जारी रखें। लंबी अवधि के बॉन्ड में हालिया तेजी को देखकर जल्दबाजी में निवेश करने से बचें।
फैसले से पहले की क्विक चेकलिस्ट: अपने लोन का बेंचमार्क और स्प्रेड चेक करें, प्री-पेमेंट की योजना बनाएं और एफडी को अलग-अलग समय के लिए बांटें। इमरजेंसी फंड को लिक्विड फंड्स में रखें। इक्विटी SIP को पहले की तरह चलने दें, लेकिन डेट फंड्स में निवेश किश्तों में करें। 5 जून को आने वाले बयान में महंगाई के रास्ते और लिक्विडिटी को लेकर आरबीआई की टिप्पणियों पर नजर रखें।


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