RBI MPC बैठक: रेपो रेट में बदलाव से EMI और FD पर क्या असर होगा? जानें सही रणनीति

आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 3 से 5 अगस्त (सोमवार से बुधवार) तक होने वाली है। अब सबके मन में एक ही सवाल है: क्या रेपो रेट में बदलाव से आपकी जेब पर तुरंत असर पड़ेगा? अगर आपका फ्लोटिंग लोन एक्सटर्नल बेंचमार्क लिंक्ड रेट (EBLR) से जुड़ा है, तो बदलाव का असर जल्दी (अक्सर हर महीने) दिखेगा। वहीं, MCLR वाले लोन में यह बदलाव थोड़ा रुककर, यानी अगली रीसेट डेट पर होता है। इसलिए, यह जानना जरूरी है कि आपका लोन किस कैटेगरी में है और उसकी रीसेट डेट क्या है।

मान लीजिए आपने 20 साल के लिए 50 लाख रुपये का होम लोन लिया है। 9% ब्याज दर पर आपकी EMI करीब 44,986 रुपये बनती है। अगर ब्याज दर में 0.25% (25 bps) की कटौती होती है, तो EMI घटकर 44,186 रुपये के आसपास आ जाएगी। वहीं, 0.25% की बढ़ोतरी इसे 45,793 रुपये तक पहुंचा सकती है। महीने के हिसाब से यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन सालों के दौरान यह एक बड़ी रकम बन जाती है। प्री-पेमेंट या रिफाइनेंसिंग का फैसला लेने से पहले अपनी रीसेट साइकिल जरूर चेक करें।

RBI MPC Meeting 2026: Impact of Repo Rate Changes on Your EMI, FD, and Debt Funds Strategy

RBI MPC: FD और RD पर क्या होगा असर और कैसे करें तैयारी

फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और रिकरिंग डिपॉजिट (RD) की दरों में बदलाव की रफ्तार अलग-अलग होती है। बड़े बैंक कुछ दिनों या हफ्तों में दरें बदलते हैं, जबकि स्मॉल फाइनेंस बैंक ज्यादा तेजी से रिएक्ट करते हैं। सीनियर सिटीजन को मिलने वाला एक्स्ट्रा ब्याज भी आमतौर पर इसी हिसाब से बदलता है। अगर दरें बढ़ती हैं, तो 'लैडरिंग' (अलग-अलग समय के लिए निवेश) का तरीका अपनाएं ताकि लिक्विडिटी भी बनी रहे और बढ़ी हुई दरों का फायदा भी मिले। पुरानी और ज्यादा ब्याज वाली FD को तब तक न तोड़ें जब तक कि पेनल्टी और टैक्स काटने के बाद भी आपको बड़ा फायदा न दिख रहा हो। 1 लाख रुपये पर मिलने वाले रिटर्न को नीचे दी गई टेबल से समझें।

RBI MPC: 5, 10 और 15 साल में FD पर कितना मिलेगा रिटर्न

FD ब्याज दर5 साल10 साल15 साल
6.5%Rs 1,37,009Rs 1,87,714Rs 2,57,184
7.5%Rs 1,43,563Rs 2,06,103Rs 2,95,888
8.5%Rs 1,50,366Rs 2,26,098Rs 3,39,974

RBI MPC: डेट फंड, क्रेडिट रिस्क और लिक्विडिटी का गणित

ब्याज दरों में बदलाव का असर डेट फंड्स पर ड्यूरेशन और क्रेडिट स्प्रेड के जरिए पड़ता है। लॉन्ग ड्यूरेशन फंड्स में हर छोटे बदलाव का बड़ा असर दिखता है। वहीं, क्रेडिट-ओरिएंटेड फंड्स जारीकर्ता (issuer) के स्प्रेड पर निर्भर करते हैं। अगर दरें घटती हैं, तो ड्यूरेशन फंड्स में फायदा हो सकता है, जबकि दरों के स्थिर रहने पर 'कैरी' (नियमित आय) बेहतर रहती है। थोड़े समय के लिए पैसा रखने के लिए लिक्विड और ओवरनाइट फंड्स सबसे सुरक्षित हैं। उसी दिन की NAV पाने के लिए कट-ऑफ टाइम से पहले निवेश करना जरूरी है। खरीदारी और इंस्टेंट रिडेम्पशन के लिए अपने फंड हाउस की टाइमिंग जरूर चेक कर लें।

RBI MPC: पॉलिसी के दिन क्या करें और क्या न करें

सबसे पहले चेक करें कि आपका लोन EBLR है या MCLR, और अगली रीसेट डेट कब है। इस वीकेंड जल्दबाजी में प्री-पेमेंट न करें; बुधवार के फैसले का इंतजार करें। जब तक स्थिति साफ न हो, एक्स्ट्रा पैसा ओवरनाइट या लिक्विड फंड में रखें। FD के लिए अलग-अलग समय सीमा (tenors) चुनें। अपना KYC, नेटबैंकिंग और UPI लिमिट पहले से तैयार रखें ताकि सोमवार सुबह आप तुरंत एक्शन ले सकें।

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