नयी दिल्ली। RBI Credit Policy : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने गुरुवार 6 फरवरी को हुई अपनी मॉनिटरिंग कमेटी की मीटिंग में रेपो रेट को नहीं घटाने का फैसला किया है। बता दें कि यह वित्त वर्ष 2019-20 की आरबीआई की आखिरी पॉलिसी नीति समीक्षा बैठक रही, जिसमें मौजूदा रेपो रेट को ही बरकरार रखा गया है। इस समय रेपो रेट 5.15 फीसदी है। साथ ही रिवर्स रेपो रेट को भी 4.90 फीसदी पर ही बरकरार रखा गया है। ग्रोथ को जब तक सहारा देने के लिए आरबीआई की समीक्षा समिति ने अपना रुख 'Accommodative' ही बरकरार रखा है। साथ ही कहा है कि मुद्रास्फीति लक्ष्य के अंदर ही है। आरबीआई गवर्नर शक्तिदांस सहित समिति के बाकी सभी सदस्यों ने रेपो रेट में कोई बदलाव न करने के पक्ष में वोट डाला। बाकी सदस्यों में चेतन घाटे, पामी दुआ, रवींद्र ढोलकिया, जनक राज और माइकल देवव्रत पात्रा शामिल हैं।

आरबीआई ने लगाया विकास दर के लिए अनुमान
आरबीआई ने वित्त वर्ष 2020-21 के लिए अनुमानित विकास दर 6 फीसदी रखी है। यानी आरबीआई के अनुसार 2020-21 में देश की विकास दर 6 फीसदी रह सकती है। इनमें अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही में विकास दर 5.5-6 फीसदी और तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में 6.2 फीसदी रह सकती है।
मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री काफी रोचक है। पूरे मोदी सरकार के कार्यकाल में यह दर कभी उतना नहीं रही जितनी दर ठीक मोदी सरकार के शपथ के ठीक पहले थी। जब मोदी सरकार ने कार्यकाल संभाला तो रेपो रेट की दर 8 फीसदी थी, जो फिर कभी उतनी नहीं हुई है।
ये है रेपो रेट का सफर
- 5 दिसंबर 2019 5.15 फीसदी
-4 अक्टूबर 2019 को 5.15 फीसदी
-7 अगस्त 2019 को 5.40 फीसदी
-6 जून 19 को 5.75 फीसदी
-04 अप्रैल 19 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 19 को 6.25 फीसदी
-05 दिसंबर 18 को 6.50 फीसदी
-05 अक्टूबर 18 को 6.50 फीसदी
-01 अगस्त 18 को 6.50 फीसदी
-06 जून 18 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 18 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 18 को 6.00 फीसदी
-06 दिसंबर 17 को 6.00 फीसदी
-04 अक्टूबर 17 को 6.00 फीसदी
-02 अगस्त 17 को 6.00 फीसदी
-08 जून 17 को 6.25 फीसदी
-06 अप्रैल 17 को 6.25 फीसदी
-08 फरवरी 17 को 6.25 फीसदी
-07 दिसंबर 16 को 6.25 फीसदी
-04 अक्टूबर 16 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 16 को 6.50 फीसदी
-29 सितंबर 15 को 6.75 फीसदी
-02 जनवरी 15 को 7.25 फीसदी
-04 मार्च 15 को 7.50 फीसदी
-15 जनवरी 15 को 7.75 फीसदी
-28 जनवरी 14 को 8.00 फीसदी
मॉनिटरी पॉलिसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का मतलब
रेपो रेट
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन वगैरह।
रिवर्स रेपो रेट
जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है. बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे।
सीआरआर
देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।
एसएलआर
जिस दर पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते है, उसे एसएलआर कहते हैं। नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। कमर्शियल बैंकों को एक खास रकम जमा करानी होती है जिसका इस्तेमाल किसी इमरजेंसी लेन-देन को पूरा करने में किया जाता है। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बगैर नकदी की तरलता कम करना चाहता है तो वह सीआरआर बढ़ा देता है, इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए कम रकम बचती है।
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