OLD Vs New Tax Regime: इन्कम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का समय आ गया है। इस वक्त लाखों नौकरीपेशा लोग सोच में हैं कि उन्हें नया टैक्स सिस्टम अपनाना चाहिए या पुराने वाले पर ही टिके रहना चाहिए। दोनों के अपने फायदे और नुकसान हैं, लेकिन सही विकल्प चुनने के लिए आपके इनकम और खर्च के तरीकों को समझना जरूरी है।

नया टैक्स सिस्टम: कम रेट पर कम छूट
सरकार ने नई टैक्स व्यवस्था को आसान बनाने की कोशिश की है। इसमें टैक्स स्लैब की दरें कम हैं लेकिन इन्वेस्टमेंट पर मिलने वाली छूट हटा दी गई है।
नया टैक्स स्लैब (FY 2025-26)
सालाना इनकम टैक्स दर
0 से 3 लाख 0%
3 से 6 लाख 5%
6 से 9 लाख 10%
9 से 12 लाख 15%
12 से 15 लाख 20%
15 लाख से अधिक 30%
अगर आपकी इनकम 7 लाख रुपए तक है, तो आपको कोई टैक्स नहीं देना होगा क्योंकि इसमें सेक्शन 87A के तहत पूरी छूट मिलती है।
नई व्यवस्था में क्या नहीं मिलेगा?
नए टैक्स सिस्टम में आपको इन डिडक्शन का फायदा नहीं मिलेगा, सेक्शन 80C (LIC, PPF, ELSS), HRA (हाउस रेंट अलाउंस), होम लोन का ब्याज, हेल्थ इंश्योरेंस पर छूट (80D) यानी अगर आप इन निवेशों के जरिए टैक्स बचाते थे, तो नई व्यवस्था आपके लिए कम फायदेमंद हो सकती है।
पुराना टैक्स सिस्टम: छूटों की भरमार
पुरानी टैक्स व्यवस्था में टैक्स की दरें थोड़ी ज्यादा हैं, लेकिन इसमें 70 से ज्यादा तरह की टैक्स छूट मिलती है। अगर आप सालाना कुछ राशि निवेश करते हैं, तो आपकी टैक्स देनदारी काफी घट सकती है।
पुराना टैक्स स्लैब:
सालाना इनकम टैक्स दर
0 से 2.5 लाख 0%
2.5 से 5 लाख 5%
5 से 10 लाख 20%
10 लाख से ऊपर 30%
प्रमुख छूटें जो मिलती हैं:
80C के तहत ₹1.5 लाख की छूट
EPF में योगदान
HRA (अगर किराए पर रहते हैं)
मेडिकल इंश्योरेंस (80D)
NPS में नियोक्ता का योगदान (80CCD(2))
किसे क्या चुनना चाहिए?
नई टैक्स व्यवस्था चुनें, अगर आप निवेश नहीं करते हैं या बचत पर जोर नहीं है। सैलरी स्ट्रक्चर ऐसा है जिसमें ज्यादातर हिस्सा फिक्स्ड पे है। आपको झंझट नहीं चाहिए और टैक्स फाइलिंग को आसान बनाना चाहते हैं।
पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनें, अगर आप नियमित रूप से LIC, PF, ELSS जैसे निवेश करते हैं। किराए के घर में रहते हैं और HRA क्लेम करना चाहते हैं। आपके पास होम लोन या हेल्थ इंश्योरेंस जैसे खर्च हैं।
टैक्स स्लैब का चुनाव कोई सामान्य फैसला नहीं है। यह आपकी सालाना इनकम, खर्चों और बचत की योजना पर निर्भर करता है। जल्दबाज़ी में न आएं, अपने फाइनेंशियल डेटा को अच्छे से समझें और उसी हिसाब से टैक्स सिस्टम चुनें।
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