Rupee Dollar Exchanges Rate: आज रुपया 12 पैसे टूटा, जानें किस स्तर तक गिरा

Rupee Dollar Exchanges Rate: डॉलर के मुकाबले रुपया आज कमजोरी के साथ बंद हुआ। आज डॉलर के मुकाबले रुपया 12 पैसे की कमजोरी के साथ 82.18 रुपये के स्तर पर बंद हुआ। डॉलर में कारोबार काफी समझदारी से करने की जरूरत होती है, नहीं तो निवेश पर असर पड़ सकता है।

डिमांड सप्लाई तय करता है भाव

करेंसी एक्सपर्ट के अनुसार रुपये (Rupee) की कीमत पूरी तरह इसकी डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का भी इस पर असर पड़ता है। हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है। विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है। अमरीकी डॉलर (dollar) को वैश्विक करेंसी का रुतबा हासिल है और ज्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं।

Rupee Dollar Exchanges Rate

पहली वजह है तेल के बढ़ते दाम

रुपये (Rupee) के लगातार कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल के बढ़ते दाम हैं। भारत कच्चे तेल के बड़े इंपोर्टर्स में एक है। भारत ज्यादा तेल इंपोर्ट करता है और इसका बिल भी उसे डॉलर (dollar) में चुकाना पड़ता है।

दूसरी वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली

विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजारों में अक्सर जमकर बिकवाली करते हैं। जब ऐसा होता है तो रुपये (Rupee) पर दबाव बनता है और यह डॉलर (dollar) के मुकाबले टूट जाता है।

महंगे डॉलर का जानिए आप पर असर

देश में अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी क्रूड ऑयल का आयात करना पड़ता है। इसमें भारत को काफी ज्यादा डालर खर्च करना पड़ता है। यह देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनाता है, जिसका असर रुपये की कीमत पर पड़ता है। अगर डॉलर महंगा होगा, तो हमें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है, और अगर डॉलर सस्ता हो तो थोड़ी राहत मिल जाती है। रोज यह उठा पटक डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति को बदलती रहती है।

आजादी के समय रुपये का स्तर

एक जमाना था जब अपना रुपया डॉलर को जबरदस्त टक्कर दिया करता था। जब भारत 1947 में आजाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दाम बराबर का था। मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया था। तब देश पर कोई कर्ज भी नहीं था। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये। 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा।

वहीं बीते हफ्ते भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़ा है। विदेशी निवेशकों के बढ़ते निवेश के चलते बीते आठ दिसंबर को समाप्त सप्ताह के दौरान भारत के विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ा है। इस सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 2.816 अरब डॉलर बढ़कर 606.859 अरब डॉलर के स्तर पर आ गया। विदेशी मुद्रा भंडार का यह 4 महीने का उच्चतम स्तर है।

विदेशी मुद्रा के मामले में दुनिया के टॉप 5 देश

चीन: 3.11 ट्रिलियन डॉलर
जापान: 1.23 ट्रिलियन डॉलर
स्विट्जरलैंड: 876,985 बिलियन डॉलर
भारत: 606,859 बिलियन डॉलर
रूस: 592,900 बिलियन डॉलर

नोट: यह आंकड़े शनिवार तक के अपडेट हैं।

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