Share Market: बड़े नाम... बड़ी उम्मीदें... और बड़ा भरोसा, लेकिन क्या हो जब यही बड़े नाम आपके पैसे को बढ़ाने के बजाय उसे डुबाने लगें? क्या हो जब जिन कंपनियों को "safe investment" माना जाता है, वही निवेशकों के लिए सबसे बड़ी निराशा बन जाएं?

आमतौर पर हर निवेशक को यह सलाह दी जाती है कि अगर लंबी अवधि में पैसा बनाना है, तो बड़ी और मजबूत कंपनियों में निवेश करो, क्योंकि उनका track record अच्छा होता है, उनका business stable होता है और risk बाकी के मुकाबले कम होता है। लेकिन पिछले 3 सालों के आंकड़े इस पूरी सोच को चुनौती देते नजर आ रहे हैं।
देश की दिग्गज आईटी कंपनी TCS, जो सालों से निवेशकों की पहली पसंद रही है, उसने पिछले 3 साल में करीब 34% का निगेटिव रिटर्न दिया है। IndusInd Bank लगभग 33% नीचे रहा, ITC में करीब 32% की गिरावट देखने को मिली, HUL यानी Hindustan Unilever में करीब 18% की कमजोरी रही और Asian Paints भी करीब 16% गिरा।
IT सेक्टर की दूसरी बड़ी कंपनी Infosys में करीब 13% का निगेटिव रिटर्न देखने को मिला, जबकि HDFC Bank, जिसे भारत के सबसे मजबूत प्राइवेट बैंकों में गिना जाता है, वह भी करीब 6.98% नीचे रहा। इसके अलावा Wipro, HDFC Life और HCL Tech जैसी कंपनियों ने भी पिछले 3 सालों में निवेशकों को खास रिटर्न नहीं दिया, बल्कि कई मामलों में नुकसान ही हुआ।
यानी साफ है कि यह सिर्फ एक-दो कंपनियों की कहानी नहीं है, बल्कि एक broader trend है, जहां Large Cap या Bluechip कंपनियां भी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पा रही हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसके पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे पहली वजह है valuation। जब किसी कंपनी का valuation बहुत ज्यादा हो जाता है, तो उसमें future growth की उम्मीदें पहले ही price में शामिल हो जाती हैं।
दूसरी बड़ी वजह है वैश्विक और घरेलू आर्थिक वृद्धि में सुस्ती। खासकर आईटी क्षेत्र में, जहां TCS, Infosys, Wipro और HCL Tech जैसी कंपनियां शामिल हैं, वहां अंतरराष्ट्रीय मांग में कमी आई है। अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों में आर्थिक सुस्ती, मंदी की आशंका और कंपनियों द्वारा तकनीकी खर्च में कटौती का सीधा असर इन कंपनियों की आय और विकास पर पड़ा है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में आईटी शेयरों पर दबाव बना हुआ है।
तीसरी वजह है बाजार के बदलते रुझान। पिछले 2-3 वर्षों में निवेशकों का झुकाव तेजी से मझोले और छोटे शेयरों यानी कि मिड और स्मॉलकैप की ओर बढ़ा है, क्योंकि वहां अधिक तेजी से ग्रोथ की संभावना दिखाई दी। कई मझोली और छोटी कंपनियों ने कई गुना रिटर्न दिए, जिससे निवेशकों का पैसा बड़ी कंपनियों से निकलकर इन वर्गों में चला गया। इसका असर यह हुआ कि बड़ी कंपनियों के शेयरों में तेजी कम हो गई और कई जगह ठहराव या गिरावट देखने को मिली।
चौथी वजह sector-specific challenges भी हैं। जैसे banking sector में NPA concerns और competition का असर पड़ा है। FMCG सेक्टर में डिमांड स्लोडाउन और मार्जिन प्रेशर देखने को मिला है, जिससे HUL और ITC जैसी कंपनियों के परफॉर्मेंस पर असर पड़ा। इसके साथ सरकार की ओर से बढ़ाए गए टैक्स के बाद निवेशकों ने itc से दूरी बनानी शुरू की।
Paint sector में रॉ मेटेरियल कॉस्ट और कॉम्पिटिशन बढ़ने से Asian Paints जैसी कंपनियों पर दबाव बना। यानी हर सेक्टर की अपनी-अपनी चुनौतियां हैं, जिसने ओवरऑल रिटर्न को प्रभावित किया है। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण फैक्टर है इनवेस्टर साइकोलॉजी। ज्यादातर निवेशक फैमिलियर और ट्रस्टेड नेम्स में ही पैसा लगाना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां रिस्क कम होगा। लेकिन कई बार यही comfort zone नुकसान का कारण बन जाता है।
[Disclaimer: यहां व्यक्त किए गए विचार और सुझाव केवल व्यक्तिगत विश्लेषकों या इंस्टीट्यूशंस के अपने हैं। ये विचार या सुझाव Goodreturns.in या ग्रेनियम इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (जिन्हें सामूहिक रूप से 'We' कहा जाता है) के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। हम किसी भी कंटेंट की सटीकता, पूर्णता या विश्वसनीयता की गारंटी, समर्थन या ज़िम्मेदारी नहीं लेते हैं, न ही हम कोई निवेश सलाह प्रदान करते हैं या प्रतिभूतियों (सिक्योरिटीज) की खरीद या बिक्री का आग्रह करते हैं। सभी जानकारी केवल सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए प्रदान की जाती है और कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले लाइसेंस प्राप्त वित्तीय सलाहकारों से स्वतंत्र रूप से सत्यापित जरूर करें।]


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