बड़ी खबर : RBI ने नहीं बदला रेपो रेट, ब्याज दरें नहीं घटेंगी

नई दिल्ली, फरवरी 10। रिजर्व बैंक ने आज अपनी मौद्रिक नीति का ऐलान कर दिया है। पिछली कई बार की तरह इस बार भी आरबीआई ने रेपो और रिवर्स रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। इस प्रकार इस बार भी जहां रेपो रेट 4 फीसदी पर बनी रहेगी, वहीं रिवर्स रेपो रेट 3.35 फीसदी पर बनी रहेंगी। रेपो रेट 22 मई 2020 से लगातार 4 फीसदी पर बनी हुई हैं। रिजर्व बैंक यह मौद्रिक नीति की समीक्षा बैठक 8 फरवरी को शुरू हुई थी। मौद्रिक नीति की घोषणा का ऐलान आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने किया है।

जानिए आरबीआई का महंगाई पर अनुमान

सीपीआई महंगाई ज्यादा रहीद, लेकिन यह उम्मीद के मुताबिक रही। कोर महंगाई भी ज्यादा है और हेडलाइन महंगाई के वित्त वर्ष 2022 की चौथी तिमाही में चरम पर पहुंचने की आशंका है। वित्त वर्ष 2023 में महंगाई का टारगेट घटाकर 4.5 फीसदी रखा गया है। अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में महंगाई के 4.9 फीसदी, दूसरी तिमाही में 5 फीसदी, तीसरी तिमाही में 4 फीसदी और चौथी तिमाही में 4.2 फीसदी रहने का अनुमान है।

जीडीपी पर आरबीआई की राय

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने यहां मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक के बाद बताया कि वित्त वर्ष 2023 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.8 फीसदी रह सकती है। वहीं आरबीआई ने अकोमडेटिव रुख को बरकरार रखने का फैसला भी किया है।

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ई-रूपी प्रीपेड डिजिटल वाउचर की सीमा बढ़ाई

वहीं आरबीआई ने ई-रूपी प्रीपेड डिजिटल वाउचर की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। ई-रूपी प्रीपेड डिजिटल वाउचर की मौजूदा सीमा फिलहाल 10,000 रुपए है। अब आरबीआई ने इसे बढ़ाकर 1 लाख रुपए प्रति वाउचर करने का ऐलान किया है। ई-रूपी प्रीपेड डिजिटल वाउचर की सीमा बढ़ जाने से इसका इस्तेमाल 1 से ज्यादा बार किया जा सकता है।

बैंकों की बैलेंसशीट मजबूत

आरबीआई गवर्नर ने इस दौरान बताया है कि देश में बैंकों की बैलेंसशीट मजबूत हुई है। हालांकि बैंकों को गवर्नेंस और रिस्क मैनेजमेंट मजबूत करने की जरूरत है। हालांकि कच्चे तेल में बढ़ोतरी से चिंता बरकरार है। सिस्टम में लिक्विडिटी का बड़ा सरप्लस बरकरार है। उन्होंने कहा कि देश की एक्सपोर्ट डिमांड बढ़ने की उम्मीद है।

जानिए क्या होते हैं अकोमोडेटिव और न्यूट्रल स्टैंस

अकोमोडेटिव स्टैंस का मतलब है कि निकट भविष्य में आरबीआई पॉलिसी रेट में कमी करने जा रहा है। बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाता है। आम तौर पर जब एमपीसी का स्टैंस अकोमोडेटिव होता है तो पॉलिसी रेट में वृद्धि की उम्मीद नहीं की जाती है।

वहीं न्यूट्रल स्टैंस का मतलब है कि एमपीसी स्थिति के मुताबिक पॉलिसी रेट में कमी या वृद्धि कर सकता है। पिछले दो साल से आरबीआई की एमपीसी ने अकोमोडेटिव स्टैंस अपना रखा है। इसका मकसद कोरोना की मार से बेहाल इकोनॉमी की हेल्प करना था।

ब्याज दरें नहीं घटेंगी

आमतौर पर माना जाता है कि अगर रेपो रेट में कमी आती है, तो बैंक देर सबेर अपनी ब्याज दरें कम करते हैं। लेकिन इस बार भी रेपो और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव नहीं किया गया है, तो ऐसे में लोन की ब्याज दरें अपरवर्तित रह सकती हैं।

मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री

मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री काफी रोचक है। पूरे मोदी सरकार के कार्यकाल में यह दर कभी उतना नहीं रही जितनी दर ठीक मोदी सरकार के शपथ के ठीक पहले थी। जब मोदी सरकार ने कार्यकाल संभाला तो रेपो रेट की दर 8 फीसदी थी, जो फिर कभी उतनी नहीं हुई है।

ये है रेपो रेट का सफर

-8 दिसंबर 21 को 4 फीसदी
-8 अक्टूबर 21 को 4 फीसदी
-6 अगस्त 21 को 4 फीसदी
-4 जून 21 को 4 फीसदी
-7 अप्रैल 21 को 4 फीसदी
-5 फरवरी 21 को 4.00 फीसदी
-4 दिसंबर 20 को 4.00 फीसदी
-9 अक्टूबर 20 को 4.00 फीसदी
-6 अगस्त 20 को 4.00 फीसदी
-22 मई 2020 को 4.00 फीसदी
-27 मार्च 2020 को 4.40 फीसदी
-4 अक्टूबर 2019 को 5.15 फीसदी
-7 अगस्त 2019 को 5.40 फीसदी
-6 जून 19 को 5.75 फीसदी
-04 अप्रैल 19 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 19 को 6.25 फीसदी
-05 दिसंबर 18 को 6.50 फीसदी
-05 अक्टूबर 18 को 6.50 फीसदी
-01 अगस्त 18 को 6.50 फीसदी
-06 जून 18 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 18 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 18 को 6.00 फीसदी
-06 दिसंबर 17 को 6.00 फीसदी
-04 अक्टूबर 17 को 6.00 फीसदी
-02 अगस्त 17 को 6.00 फीसदी
-08 जून 17 को 6.25 फीसदी
-06 अप्रैल 17 को 6.25 फीसदी
-08 फरवरी 17 को 6.25 फीसदी
-07 दिसंबर 16 को 6.25 फीसदी
-04 अक्टूबर 16 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 16 को 6.50 फीसदी
-29 सितंबर 15 को 6.75 फीसदी
-02 जनवरी 15 को 7.25 फीसदी
-04 मार्च 15 को 7.50 फीसदी
-15 जनवरी 15 को 7.75 फीसदी
-28 जनवरी 14 को 8.00 फीसदी

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मॉनिटरी पॉलिसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का मतलब

क्या होती है रेपो रेट
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन वगैरह।

क्या होती है रिवर्स रेपो रेट

जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है. बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे।

क्या होती है सीआरआर

देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।

क्या होती है एसएलआर

जिस दर पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते है, उसे एसएलआर कहते हैं। नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। कमर्शियल बैंकों को एक खास रकम जमा करानी होती है जिसका इस्तेमाल किसी इमरजेंसी लेन-देन को पूरा करने में किया जाता है। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बगैर नकदी की तरलता कम करना चाहता है तो वह सीआरआर बढ़ा देता है, इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए कम रकम बचती है।

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