RBI Credit Policy: रिजर्व बैंक की मॉनिटरी कमेटी की बैठक के बाद गर्वनर शक्तिकांत दास ने रेपो रेट को स्थिर रखने का ऐलान किया है। इस प्रकार से रेपो रेट 6.50 फीसदी पर बनी रहेगी। रेपो रेट पिछले काफी समय से स्थिर बनी हुई है। रिवर्ज बैंक का मानना है कि आर्थिक स्थिति काबू में है, जिसके चलते यह फैसला संभव हो सकता है। आरबीआई के इस फैसले से उम्मीद है कि अब लोन ज्यादा महंगा नहीं होगा।
रेपो रेट में 250 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का ट्रांसमिशन अभी भी अधूरा है।
एमपीसी ने 1 के मुकाबले 5 वोटों से रेपो रेट पर फैसला लिया है।
स्थायी जमा सुविधा और सीमांत स्थायी सुविधा दरें भी 6.25 प्रतिशत और 6.75 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रहेंगी।
वैश्विक हेडलाइन मुद्रास्फीति कम हो रही है, लेकिन कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के लक्ष्य से ऊपर है।
सॉवरेन बांड की यील्ड मजबूत हुई है।
दूसरी तिमाही में घरेलू कृषि गतिविधियों में गति बरकरार रही, हालांकि मानसून कुछ हद तक असमान था।

महंगाई को लेकर क्या कहा
- जुलाई-सितंबर 2023 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान 6.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया गया
- अक्टूबर-दिसंबर 2023 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान 5.7 प्रतिशत से घटाकर 5.6 प्रतिशत कर दिया गया
- जनवरी-मार्च 2024 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान 5.2 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रहा
- अप्रैल-जून 2024 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान 5.2 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रहा
जीडीपी का अनुमान
- जुलाई-सितंबर 2023 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि का अनुमान 6.5 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा गया
- अक्टूबर-दिसंबर 2023 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि का अनुमान 6.0 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा गया
- जनवरी-मार्च 2024 के लिए जीडीपी वृद्धि का अनुमान 5.7 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा गया
गुड रिटर्न ने पहले एक सर्वे में इस बात का खुलासा किया था कि रेपो रेट नहीं बदलेगा।
एमपीसी के 6 सदस्य कौन
आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास, डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा के अलावा 4 नॉमित सदस्य हैं। इनके नाम हैं आशिमा गोयल, राजीव रंजन, जयन्त आर. वर्मा और शशांक भिडे।
मोदी सरकार के कार्यकाल में रेपो रेट की हिस्ट्री
मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री काफी रोचक है। पूरे मोदी सरकार के कार्यकाल में यह दर कभी उतना नहीं रही जितनी दर ठीक मोदी सरकार के शपथ के ठीक पहले थी। जब मोदी सरकार ने कार्यकाल संभाला तो रेपो रेट की दर 8 फीसदी थी, जो फिर कभी उतनी नहीं हुई है।
ये है रेपो रेट का सफर
- 10 अगस्त 23 को 6.50 फीसदी
- 8 जून 23 को 6.50 फीसदी
- 4 अप्रैल 23 को 6.50 फीसदी
- 8 फरवरी 23 को 6.50 फीसदी
- 7 दिसंबर 22 को 6.25 फीसदी
- 30 सितंबर 22 को 5.90 फीसदी
- 5 अगस्त 22 को 5.40 फीसदी
- 8 जून 22 को 4.90 फीसदी
- 4 मई 22 को 4.40 फीसदी
- 10 फरवरी 22 को 4 फीसदी
- 8 दिसंबर 21 को 4 फीसदी
- 8 अक्टूबर 21 को 4 फीसदी
- 6 अगस्त 21 को 4 फीसदी
- 4 जून 21 को 4 फीसदी
- 7 अप्रैल 21 को 4 फीसदी
- 5 फरवरी 21 को 4.00 फीसदी
- 4 दिसंबर 20 को 4.00 फीसदी
- 9 अक्टूबर 20 को 4.00 फीसदी
- 6 अगस्त 20 को 4.00 फीसदी
- 22 मई 2020 को 4.00 फीसदी
- 27 मार्च 2020 को 4.40 फीसदी
- 4 अक्टूबर 2019 को 5.15 फीसदी
- 7 अगस्त 2019 को 5.40 फीसदी
- 6 जून 19 को 5.75 फीसदी
- 04 अप्रैल 19 को 6.00 फीसदी
- 07 फरवरी 19 को 6.25 फीसदी
- 05 दिसंबर 18 को 6.50 फीसदी
- 05 अक्टूबर 18 को 6.50 फीसदी
- 01 अगस्त 18 को 6.50 फीसदी
- 06 जून 18 को 6.25 फीसदी
- 05 अप्रैल 18 को 6.00 फीसदी
- 07 फरवरी 18 को 6.00 फीसदी
- 06 दिसंबर 17 को 6.00 फीसदी
- 04 अक्टूबर 17 को 6.00 फीसदी
- 02 अगस्त 17 को 6.00 फीसदी
- 08 जून 17 को 6.25 फीसदी
- 06 अप्रैल 17 को 6.25 फीसदी
- 08 फरवरी 17 को 6.25 फीसदी
- 07 दिसंबर 16 को 6.25 फीसदी
- 04 अक्टूबर 16 को 6.25 फीसदी
- 05 अप्रैल 16 को 6.50 फीसदी
- 29 सितंबर 15 को 6.75 फीसदी
- 02 जनवरी 15 को 7.25 फीसदी
- 04 मार्च 15 को 7.50 फीसदी
- 15 जनवरी 15 को 7.75 फीसदी
मॉनिटरी पॉलिसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का मतलब
क्या होती है रेपो रेट: रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन वगैरह।
क्या होती है रिवर्स रेपो रेट: जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है. बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे।
क्या होती है सीआरआर: देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।
क्या होती है एसएलआर: जिस दर पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते है, उसे एसएलआर कहते हैं। नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। कमर्शियल बैंकों को एक खास रकम जमा करानी होती है जिसका इस्तेमाल किसी इमरजेंसी लेन-देन को पूरा करने में किया जाता है। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बगैर नकदी की तरलता कम करना चाहता है तो वह सीआरआर बढ़ा देता है, इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए कम रकम बचती है।


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