Gold vs Dollar: Jefferies का सोने पर बड़ा खुलासा, उड़ गई Donald Trump की नींद?

Gold vs Dollar: दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। सवाल यह है कि क्या डॉलर की वैश्विक बादशाहत धीरे-धीरे कमजोर हो रही है? और क्या हजारों साल पुराना एसेट, यानी सोना, एक बार फिर दुनिया का सबसे भरोसेमंद निवेश विकल्प बनता जा रहा है?

इन सवालों को हवा दी है वैश्विक निवेश बैंक Jefferies की एक ताजा रिपोर्ट ने। रिपोर्ट के अनुसार, इतिहास में पहली बार दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों (Central Banks) के पास अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की तुलना में अधिक मूल्य का गोल्ड रिजर्व मौजूद है। विशेषज्ञ इसे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत मान रहे हैं।

केंद्रीय बैंक क्यों बढ़ा रहे हैं सोने की हिस्सेदारी?

Gold vs Dollar

Jefferies की रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने बड़े पैमाने पर सोने की खरीदारी की है। इसके चलते उनके कुल विदेशी मुद्रा भंडार में गोल्ड की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती गई है और अब यह अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स से आगे निकल चुकी है।

यह सिर्फ एक निवेश रणनीति नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक सोच में बदलाव का संकेत माना जा रहा है। कई देश अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अधिक संतुलित और विविध बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

अमेरिका का बढ़ता कर्ज बना चिंता का कारण

विशेषज्ञों के अनुसार इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह अमेरिका का लगातार बढ़ता सरकारी कर्ज है। अमेरिकी सरकार पर कर्ज का बोझ रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है और स्थिति यह है कि केवल ब्याज भुगतान के लिए ही हर साल 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च करना पड़ रहा है।

जब किसी देश की आय का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में जाने लगे, तो निवेशकों और केंद्रीय बैंकों के मन में उसकी दीर्घकालिक वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि कई देशों ने डॉलर आधारित परिसंपत्तियों पर अपनी निर्भरता कम करने की रणनीति अपनानी शुरू कर दी है।

Jefferies के Chris Wood ने क्या कहा?

Jefferies के ग्लोबल इक्विटी स्ट्रेटेजिस्ट क्रिस्टोफर वुड का मानना है कि अल्पकाल में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है, लेकिन लंबी अवधि में गोल्ड की स्थिति मजबूत बनी रह सकती है।

उनके अनुसार केंद्रीय बैंकों की लगातार बढ़ती खरीदारी सोने को मजबूत आधार प्रदान कर रही है। रूस, चीन, भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं पिछले कुछ वर्षों से लगातार अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रही हैं। इन देशों का उद्देश्य डॉलर आधारित एसेट्स पर निर्भरता कम करना और अपने रिजर्व को अधिक सुरक्षित बनाना है।

भू-राजनीतिक तनाव ने भी बढ़ाई गोल्ड की मांग

रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध, वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों ने भी कई देशों को अपनी रिजर्व रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है।

कई देशों को अब यह चिंता है कि यदि भविष्य में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो केवल डॉलर आधारित रिजर्व पर निर्भर रहना जोखिम भरा साबित हो सकता है। ऐसे माहौल में सोना एक सुरक्षित और राजनीतिक रूप से तटस्थ संपत्ति के रूप में उभर रहा है।

विदेशी निवेशक भी घटा रहे हैं US Bonds में निवेश

Jefferies की रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी निवेशकों ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में अपनी हिस्सेदारी कम करना शुरू कर दिया है। केवल मार्च महीने में लगभग 135 अरब डॉलर की अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स में कमी दर्ज की गई।

विश्लेषकों का मानना है कि यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी मासिक गिरावटों में से एक है और यह संकेत देता है कि वैश्विक निवेशकों का एक वर्ग अमेरिकी कर्ज बाजार के प्रति पहले जैसा आश्वस्त नहीं है।

दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड रिजर्व वाले देश

गोल्ड रिजर्व की बात करें तो अमेरिका अभी भी दुनिया में सबसे आगे है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक के पास लगभग 8,100 टन से अधिक सोना मौजूद है।

इसके बाद जर्मनी, इटली और फ्रांस का स्थान आता है। वहीं रूस और चीन दोनों के पास 2,300 टन से अधिक गोल्ड रिजर्व है और दोनों देश लगातार अपनी होल्डिंग बढ़ा रहे हैं।

भारत भी इस दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लगभग 880 टन सोने के भंडार के साथ भारत दुनिया के शीर्ष 10 गोल्ड होल्डिंग देशों में शामिल है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी पिछले कुछ वर्षों में लगातार सोना खरीद रहा है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़ रही है।

क्या डॉलर की ताकत खत्म हो रही है?

हालांकि यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि डॉलर की वैश्विक ताकत समाप्त हो रही है। आज भी अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर में ही होता है।

लेकिन इतना जरूर है कि दुनिया के केंद्रीय बैंकों की सोच बदल रही है। अब वे केवल डॉलर पर निर्भर रहने के बजाय अपने रिजर्व को अलग-अलग परिसंपत्तियों में बांट रहे हैं। सोना, विदेशी मुद्राएं और अन्य सुरक्षित एसेट्स पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।

क्या सोना डॉलर की जगह ले सकता है?

फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि सोना निकट भविष्य में डॉलर को वैश्विक रिजर्व मुद्रा के रूप में पूरी तरह रिप्लेस कर देगा। लेकिन केंद्रीय बैंकों की बढ़ती गोल्ड खरीदारी यह जरूर दर्शाती है कि दुनिया एक अधिक बहुध्रुवीय (Multipolar) वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।

सोना एक बार फिर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के केंद्र में लौटता दिखाई दे रहा है। केंद्रीय बैंकों की तिजोरियों में लगातार बढ़ता गोल्ड इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक रिजर्व प्रबंधन की रणनीतियां पहले से काफी अलग हो सकती हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या आने वाले वर्षों में सोना और मजबूत होगा? क्या डॉलर की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ेगी? और क्या दुनिया एक नए आर्थिक संतुलन की ओर बढ़ रही है? इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।

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