El Nino Explained: भारत की अर्थव्यवस्था पर कई ऐसे खतरे मंडरा रहे हैं जो आने वाले महीनों में आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाल सकते हैं। सबसे बड़ा खतरा कमजोर मानसून और संभावित सुपर एल नीनो का है। यदि बारिश सामान्य से कम होती है तो दाल, तिलहन, सब्जियां और अन्य कृषि फसलों का उत्पादन घट सकता है। इससे खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई में तेजी आ सकती है।

गॉडजिला अल नीनो मिला निकनेम
हर साल जून में भारत उसी आवाज का इंतजार करता है। छत पर गिरती बारिश की पहली बूंदें। मॉनसून, जो हजारों सालों से इसी तरह आता रहा है। मौसम के नए अनुमान में एक चिंताजनक बात कही गई है। प्रशांत महासागर में बन रहा 'अल नीनो' अब तक का सबसे शक्तिशाली अल नीनो हो सकता है। इसे फिल्मों से लिया गया एक निकनेम भी दिया गया है - 'गॉडजिला अल नीनो'।
दक्षिण पश्चिम पहुंचा मानसून
वहीं, भारत में कम से कम दक्षिण पश्चिम मानसून तो आ गया है। यह तीन दिन की देरी से 4 जून को केरल तट पर पहुंचा और अब उत्तर की ओर बढ़ रहा है। अल नीनो के बारे में सटीक जानकारी पाना मुश्किल है। वैज्ञानिक जिस समुद्री इलाके पर सबसे ज्यादा नजर रखते हैं, उसका तापमान पहले ही उस सीमा से ऊपर जा चुका है जो अल नीनो की स्थिति को तय करती है।
यूरोप के मौसम विशेषज्ञों को इसके और बढ़ने की उम्मीद है, और दुनिया भर की जलवायु एजेंसियों ने अब आधिकारिक तौर पर अल नीनो की शुरुआत की घोषणा कर दी है। साथ ही, सितंबर तक इसके हालात के काफी मजबूत होने की संभावना है।
अल नीनो क्या है?
अल नीनो, 'अल नीनो सदर्न ऑसिलेशन' (ENSO) नाम के एक विशाल क्लाइमेट सी-सॉ (जलवायु के उतार-चढ़ाव) का एक हिस्सा है। ट्रॉपिकल पैसिफिक को एक झूले की तरह समझें। एक तरफ गर्म फेज है, जिसे अल नीनो कहते हैं। दूसरी तरफ ठंडा फेज है, जिसे ला नीना कहते हैं। आम तौर पर, 'ट्रेड विंड्स' (व्यापारिक हवाएं) पैसिफिक के गर्म सतही पानी को एशिया की तरफ धकेलती हैं।
अल नीनो के दौरान, ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। गर्म पानी वापस पूरब की ओर खिसक जाता है और समुद्र अपनी गर्मी जमा करने की जगह बदल लेता है। वैज्ञानिक सेंट्रल पैसिफिक के 'नीनो 3.4' इलाके में इस पर नजर रखते हैं। वहां का साप्ताहिक तापमान सामान्य से लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया है, जो अल नीनो का संकेत देने वाले 0.5 डिग्री के निशान से ज्यादा है।
2026 का अल नीनो कितना मजबूत होगा?
संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी, 'वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन' ने आधिकारिक तौर पर अल नीनो की शुरुआत की पुष्टि की है। एजेंसी का अनुमान है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ने का सिलसिला जारी रहेगा, 2026 के बाकी समय में इसके और मजबूत होने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत है।
'यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट' का अनुमान है कि दिसंबर तक 'नीनो 3.4' क्षेत्र का तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस ऊपर चला जाएगा, और कुछ अनुमानों के अनुसार यह 4 डिग्री तक भी पहुंच सकता है। यह 1997-1998 और 2015-2016 के संयुक्त रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ देगा। पिछले अल नीनो के कारण ही 2024 अब तक का सबसे गर्म साल दर्ज किया गया था।
भारत के लिए अल नीनो इतना जरुरी क्यों है?
भारत के लिए, अल नीनो का मतलब आमतौर पर एक ही होता है - कमजोर मॉनसून। इसकी वजह समुद्र के ऊपर की हवा में है। जब प्रशांत महासागर गर्म होता है, तो ऊपर उठने वाली हवा और भारी बारिश का दायरा, जो उस इलाके को नमी देता है, भारत से दूर पूरब की ओर खिसक जाता है और मॉनसून की हवाओं की रफ्तार कम हो जाती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस सीजन में सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया है। यह अनुमान 'लॉन्ग पीरियड एवरेज' (LPA) का लगभग 90% है, जो 1971 से 2020 के बीच 50 सालों की बारिश के डेटा के आधार पर तय किया गया एक पैमाना है। विभाग के अनुसार, बारिश की कमी वाले सीजन की संभावना 60% है।
इंडियन ओशन डाइपोल (Indian Ocean Dipole) समुद्र का एक ऐसा पैटर्न जो कभी-कभी कमजोर पड़ते मॉनसून को बचा सकता है। इसके इस साल न्यूट्रल रहने की उम्मीद है। मॉनसून सिर्फ मौसम की बात नहीं है। भारत में सालाना बारिश का लगभग 70% हिस्सा इसी से मिलता है, और देश की आधे से ज्यादा खेती-योग्य जमीन पर सिंचाई की सुविधा नहीं है।
2015-2016 में पिछली बार जब जबरदस्त अल-नीनो आया था, तो भारत में औसत बारिश का सिर्फ 86% ही हुआ और देश सूखे की चपेट में आ गया। चूंकि लगभग 60% किसान अपनी गर्मियों की फसलों के लिए इसी बारिश पर निर्भर रहते हैं, इसलिए कमजोर मॉनसून का असर सबसे पहले मिट्टी पर और उसके कुछ ही समय बाद खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दिखता है।
ऐसे देश में जहां खाने-पीने की चीजों की कीमत आज भी बारिश पर निर्भर करती है, वहां खराब मॉनसून का मतलब सिर्फ चार्ट पर दिखने वाला कोई आंकड़ा नहीं होता। यह एक अच्छे साल और मुश्किल भरे साल के बीच का फर्क होता है।
भारत में अल नीनो से क्या-क्या महंगा हो सकता है?
भारत पहले से ही अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दालों और खाद्य तेलों का आयात करता है। ऐसे में यदि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में भी मौसम खराब रहा तो आयातित खाद्य पदार्थ और महंगे हो जाएंगे।
भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती खाद्य तेलों पर बढ़ती निर्भरता है। देश अपनी जरूरत का लगभग 60% अधिक खाद्य तेल आयात करता है। अगर वैश्विक स्तर पर पाम ऑयल, सोया ऑयल या सूरजमुखी तेल की कीमतें बढ़ती हैं या निर्यातक देश आपूर्ति कम कर देते हैं तो भारत में खाने के तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। इसका असर सीधे हर घर की रसोई पर पड़ेगा। इसके अलावा तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर भी महंगे हो सकते हैं, जिससे परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ जाएगी।
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