US FED ने अपनी ताज़ा मौद्रिक नीति बैठक में लगातार चौथी बार ब्याज दरों को स्थिर रखने का फैसला किया है। फेड ने सर्वसम्मति से अपनी बेंचमार्क दर को 3.5% से 3.75% के दायरे में बनाए रखा, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया कि महंगाई के दबाव को देखते हुए आने वाले समय में दरों में बढ़ोतरी संभव है। बता दें कि फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) के 19 में से 18 सदस्यों ने अपने ब्याज दर अनुमान पेश किए, जिनमें राय बंटी हुई नजर आई।

फेड के ताज़ा अनुमान मार्च के मुकाबले ज्यादा Hawkish हैं। GFx-पहले जहां 2026 में Rate Cut की उम्मीद जताई जा रही थी, अब मजबूत लेबर मार्केट और बढ़ती महंगाई ने तस्वीर बदल दी है। फेड ने साफ कहा है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी भी "मजबूत गति" से बढ़ रही है, लेकिन महंगाई सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, हेडलाइन महंगाई का अनुमान 2.7% से बढ़ाकर 3.6% कर दिया गया है, जबकि कोर इन्फ्लेशन भी 2.7% से बढ़कर 3.3% रहने का अनुमान है।
सख्त रुख का असर उभरते बाजारों पर-
US Fed के सख्त रुख का असर भारत जैसे उभरते बाजारों पर कई स्तरों पर देखने को मिल सकता है। सबसे पहले, अगर अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं या आगे बढ़ती हैं, तो अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर मजबूत हो जाते हैं। ऐसे में विदेशी निवेशक (FIIs) बेहतर और सुरक्षित रिटर्न के लिए भारत जैसे बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ता है और खासकर मिडकैप व स्मॉलकैप शेयरों में ज्यादा गिरावट और वोलैटिलिटी देखने को मिलती है। हालांकि, मजबूत डॉलर का एक सकारात्मक पहलू भी है कि आईटी और फार्मा जैसी निर्यात-आधारित कंपनियों की कमाई में सपोर्ट मिल सकता है।
डॉलर के मजबूत होने पर रुपया कमजोर-
दूसरा बड़ा असर रुपये पर पड़ता है। डॉलर के मजबूत होने पर रुपया कमजोर होता है, जिससे आयात महंगा हो जाता है। भारत जैसे देश, जो कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, उसके लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। कमजोर रुपये और महंगे क्रूड ऑयल की वजह से पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे महंगाई (Inflation) ऊपर जा सकती है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी बढ़ने का खतरा रहता है। यह स्थिति आम उपभोक्ता से लेकर कंपनियों तक सभी के लिए लागत बढ़ा देती है।
ब्याज दर का अंतर कम-
तीसरा असर मौद्रिक नीति पर पड़ता है। अगर अमेरिका में दरें ऊंची बनी रहती हैं और भारत में दरें घटती हैं, तो दोनों देशों के बीच ब्याज दर का अंतर कम हो सकता है। ऐसे में Reserve Bank of India के लिए आक्रामक Rate Cut करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि ऐसा करने पर पूंजी का और ज्यादा आउटफ्लो हो सकता है। इसके अलावा, ग्लोबल यील्ड बढ़ने का असर भारतीय बॉन्ड मार्केट पर भी पड़ता है, जहां सरकारी और कॉरपोरेट बॉन्ड यील्ड्स ऊपर जाती हैं, जिससे उधारी महंगी हो जाती है और कंपनियों के निवेश और विस्तार की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
स्टार्टअप्स की वैल्यूएशन पर दबाव-
इसके साथ ही, ग्लोबल लिक्विडिटी कम होने से स्टार्टअप और प्राइवेट फंडिंग पर भी असर पड़ता है। वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी निवेश धीमे हो सकते हैं, जिससे स्टार्टअप्स की वैल्यूएशन पर दबाव आता है और हायरिंग या विस्तार की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। अब बात सीधा आमलोगों पर असर की करें तो Federal Reserve के सख्त रुख का असर आम लोगों पर भी सीधा पड़ता है। डॉलर मजबूत होने से रुपया कमजोर होता है, जिससे पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा की चीजें महंगी होकर महंगाई बढ़ाती हैं।
सैलरी ग्रोथ पर भी दबाव-
Reserve Bank of India भी ऐसे में जल्दी दरें नहीं घटाता, जिससे लोन और EMI ऊंची बनी रहती हैं। साथ ही बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ता है, निवेश प्रभावित होता है और नौकरी व सैलरी ग्रोथ पर भी दबाव आ सकता है...तो कुल मिलाकर, फेड का सख्त रुख भारत के लिए शॉर्ट टर्म में चुनौतियां बढ़ा सकता है मार्केट में उतार-चढ़ाव, रुपये पर दबाव, महंगाई का जोखिम और ग्रोथ की रफ्तार में थोड़ी सुस्ती हालांकि कुछ सेक्टर्स को इससे सीमित फायदा भी मिल सकता है।
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