Hormuz Crisis: Middle East में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका ने हाल ही में ईरान के कई सैन्य और समुद्री ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई और समुद्री हमले किए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक इस अभियान में फाइटर जेट, ड्रोन और युद्धपोतों का इस्तेमाल किया गया। निशाने पर ईरान के तटीय निगरानी सिस्टम, एयर डिफेंस साइट्स, सैन्य लॉजिस्टिक्स और समुद्री क्षमताएं थीं।

वहीं ईरान की समाचार एजेंसियों Tasnim और Fars के अनुसार बुशहर, कैश्म, सिरिक, बांदर-ए-लेंगेह समेत कई इलाकों में विस्फोट हुए। कई सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा, कुछ पुल क्षतिग्रस्त हुए और बिजली आपूर्ति भी प्रभावित हुई।
बंद होने वाला है Hormuz?
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि Strait of Hormuz अभी भी उसके नियंत्रण में है। IRGC ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखता है तो ईरान इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से तेल और गैस के निर्यात को रोक सकता है।
IRGC का यह भी दावा है कि उत्पादन में भारी गिरावट आई है और निर्यात लगभग ठप हो चुका है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
IEA ने क्यों जारी किया बड़ा अलर्ट?
International Energy Agency (IEA) के कार्यकारी निदेशक फैटिह बियोल ने कहा है कि यदि आने वाले कुछ हफ्तों में हॉर्मुज़ के जरिए तेल की सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना कर सकती है।
IEA के मुताबिक फिलहाल बाजार में घबराहट इसलिए सीमित रही क्योंकि चीन के पास 1 बिलियन बैरल से अधिक का तेल भंडार मौजूद है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते इस्तेमाल और सार्वजनिक परिवहन ने भी मांग पर कुछ दबाव कम किया है।
मार्च में IEA ने लगभग 400 मिलियन बैरल तेल का समन्वित स्टॉक रिलीज किया था, जिससे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में करीब 20 डॉलर प्रति बैरल तक गिरावट आई थी। हालांकि एजेंसी ने साफ किया है कि यह राहत लंबे समय तक नहीं चल सकती।
भारत समेत Asian देशों पर असर
IEA का मानना है कि अगर हॉर्मुज़ में तेल की सप्लाई बाधित होती है तो इसका सबसे ज्यादा असर एशिया के देशों पर पड़ेगा। इनमें भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे बड़े तेल आयातक देश शामिल हैं।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है और इसका प्रमुख रास्ता Strait of Hormuz है। ऐसे में अगर इस मार्ग पर लंबे समय तक बाधा आती है तो देश का आयात बिल बढ़ सकता है।
इसके अलावा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई पर दबाव, रुपये की कमजोरी और चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी जैसे जोखिम भी सामने आ सकते हैं।
सरकार के पास क्या हैं ऑप्शन?
ऐसी स्थिति में भारत सरकार रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का इस्तेमाल कर सकती है। इसके अलावा टैक्स में बदलाव, राहत पैकेज, वैकल्पिक सप्लाई स्रोतों की तलाश और घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए आयात के स्रोतों में विविधता लाने और रिन्यूएबल एनर्जी पर निवेश बढ़ाने की जरूरत होगी।
क्यों अहम है Hormuz?
Strait of Hormuz दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा कॉरिडोर माना जाता है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होता है।
अगर यह मार्ग बाधित होता है तो जहाजों को लंबे वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जिससे शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम और डिलीवरी का समय बढ़ जाएगा। इसका असर पूरी वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
IEA के पास अभी भी Reserve
IEA के मुताबिक अब तक उसके रणनीतिक तेल भंडार का लगभग 20 प्रतिशत इस्तेमाल किया जा चुका है, जबकि करीब 80 प्रतिशत स्टॉक अभी भी उपलब्ध है। जरूरत पड़ने पर सदस्य देश एक बार फिर संयुक्त रूप से तेल का स्टॉक बाजार में जारी कर सकते हैं।
हालांकि एजेंसी का कहना है कि अगर सैन्य तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो केवल रणनीतिक भंडार के भरोसे बाजार को स्थिर रखना आसान नहीं होगा।
बाज़ार में कहां रखें नज़र?
बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच तेल एवं गैस कंपनियों, एविएशन, लॉजिस्टिक्स और शिपिंग सेक्टर में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। वहीं सरकारी नीतियां, कच्चे तेल की कीमतें और IEA की अगली रणनीति भी बाजार की दिशा तय करेंगी।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब सिर्फ सैन्य संघर्ष तक सीमित नहीं रह गया है। अगर Strait of Hormuz के जरिए तेल की सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित होती है तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए आने वाले कुछ हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। ऐसे में निवेशकों, उद्योग जगत और सरकार सभी की नजर अब हॉर्मुज़ की स्थिति और IEA के अगले कदमों पर रहेगी।
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