नयी दिल्ली। वोडाफोन आइडिया क्या डूबने से बच पायेगी? ये सवाल पिछले कुछ महीनों से चल रहा है। खास कर तब से जब दिसंबर में कंपनी के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला ने एजीआर के मामले में सरकार की तरफ से राहत न मिलने पर कंपनी बंद करने का संकेत दिया था। इस बीच वोडाफोन ग्रुप पीएलसी के सीईओ निक रीड ने शुक्रवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और फिर दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद से मुलाकात की और संकट से गुजर रही कंपनी को बचाने के रास्तों पर चर्चा की। साथ ही वोडाफोन आइडिया लिमिटेड ने अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक अपने बकाया एजीआर की गणना की है। वोडाफोन के अनुसार इसका बकाया 21,533 करोड़ है, जो सरकार के करीब 53,000 करोड़ रुपये के मुकाबले आधे से भी कम है। कंपनी ने शुक्रवार को स्टॉक एक्सचेंज को बताया कि इसने दूरसंचार विभाग को एजीआर पर अपने मूल्यांकन की जानकारी दी है।
कितना है बकाया एजीआर
वोडाफोन के अनुसार कंपनी पर बकाया एजीआर 21533 करोड़ रुपये है, जिसमें 31 मार्च 2019 तक पिछले 13 सालों का 6854 करोड़ रुपये का प्रिंसिपल अमाउंट और फरवरी 2020 तक का ब्याज शामिल है। वोडोफोन ने लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम उपयोग के बकाया के रूप में अभी तक 3500 करोड़ रुपये चुकाये हैं। इस पूरे मामले पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक सवाल के जवाब में कहा कि सरकार फैसला सुनाएगी, जबकि संबंधित विभाग फैसला लेगा।
सरकार चाहती है बची रहे वोडाफोन
दूरसंचार विभाग के दफ्तर में निक रीड की बैठक के दौरान दूरसंचार मंत्री प्रसाद ने स्पष्ट किया कि सरकार चाहती है कि वोडाफोन आइडिया भारत में बरकरार रहे और निवेशित रहे। लाइवमिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार रीड ने कहा कि वोडाफोन ग्रुप भारत में एक नई और अच्छी शुरुआत करना चाहता है और देश में निवेशित रहना चाहता है। दूरसंचार विभाग में उच्चतम निर्णय लेने वाली अथॉरिटी डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन को अभी भी इस मामले पर कोई फैसला लेना है कि क्या दूरसंचार ऑपरेटरों को एजीआर से संबंधित बकाया चुकाने के लिए राहत उपाय प्रदान की जाये या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया था झटका
वोडाफोन आइडिया, जो आदित्य बिड़ला समूह की आइडिया सेल्युलर लिमिटेड के साथ वोडाफोन इंडिया लिमिटेड के विलय से बनी है, शीर्ष अदालत के प्रतिकूल फैसले के बाद से बंद होने की कगार पर रही है। अक्टूबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने एजीआर की सरकार की व्यापक परिभाषा को बरकरार रखा था, जिस पर दूरसंचार ऑपरेटरों को एजीआर का भुगतान करना होता है। इस आदेश से दूरसंचार उद्योग को बड़ा झटका लगा था।
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