नयी दिल्ली। अर्थव्यवस्था में मंदी और बढ़ती महंगाई के बीच आम जनता की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। एक नये सर्वे के मुताबिक 65.8 फीसदी भारतीय इस समय अपने दैनिक खर्चों को संभालने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। इस बात का खुलासा आईएएनएस-सीवोटर द्वारा किये गये एक सर्वे में हुआ है। बजट से पहले आये इस सर्वे को आर्थिक मोर्चे की वर्तमान जमीनी हकीकत से जोड़ कर देखा जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में खाद्य पदार्थों सहित आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है, जबकि वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसके अलावा पिछले साल देश में बेरोजगारी भी 45 सालों के उच्च स्तर पर पहुँच गई। बता दें कि दिसंबर में 4 सालों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए दिसंबर में खुदरा महंगाई दर 7.35 फीसदी पर पहुँच गयी थी। इसका मुख्य कारण प्याज, टमाटर सहित खाद्य तेलों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी रही। 7.35 फीसदी खुदरा महंगाई दर आरबीआई के अधिकतम 6 फीसदी के अनुमान से भी ज्यादा है।

यूपीए सरकार से बेहतर नहीं हालात
सर्वे बताता है मोदी सरकार के आने के बाद जनता के आर्थिक हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। यही स्थिति 2014 में यूपीए सरकार के आखिरी दिनों में भी थी। तब 65.9 फीसदी लोगों ने कहा था कि उन्हें रोजमर्रा के खर्च भी भारी पड़ रहे हैं। हालांकि मोदी सरकार के पहले साल में हालात थोड़े सुधरे थे। 2015 में ऐसे ही सर्वे में 46.1 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया था कि वे रोजाना के खर्चों से दबाव में हैं। मगर इसके बाद हालात खराब हुए हैं। इससे पता चलता है कि लोग 2020 में अपने जीवन की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं देख रहे हैं क्योंकि वे अर्थव्यवस्था की संभावना और वे अपने हालात में सुधार को लेकर नकारात्मक सोच रखते हैं।
केवल 30 फीसदी के लिए खर्च उठाना आसान
सर्वे बताता है कि केवल 30 फीसदी लोग ही महंगाई बढ़ने के बावजूद अपने खर्चे आराम से उठा पा रहे हैं। जबकि 2019 में ऐसे लोगों की संख्या 45 फीसदी थी। यानी एक साल में ही 15 फीसदी लोगों के लिए अपने खर्च संभालना मुश्किल हुआ है। 43.7 फीसदी लोगों ने कहा कि महंगाई बढ़ी है, जबकि उनकी आमदनी जस की तस है। वहीं 28.7 फीसदी के लिए मुश्किलें और बढ़ी हैं, क्योंकि आमदनी में गिरावट आयी है। ये सर्वे जनवरी 2020 के तीसरे और चौथे सप्ताह में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 11 राष्ट्रीय भाषाओं में किया गया था।
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