नयी दिल्ली। रिलायंस जियो को रिलायंस कम्युनिकेशंस या आरकॉम के बकाया एडजस्टेड ग्रोस रेवेन्यू में से कुछ हिस्से का भुगतान करना पड़ सकता है। दरअसल दूरसंचार विभाग ने इस बात पर जोर दिया है कि रिलायंस जियो को आरकॉम के 21,140 करोड़ रुपये से ज्यादा के बकाया एजीआर में से कुछ का भुगतान करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इसका कारण है कि 2016 में मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो ने दिवालिया हो रही आरकॉम से स्पेक्ट्रम खरीदे थे। दूरसंचार विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि जियो को जो एजीआर भरना है, उसमें आरकॉम के उन स्पेक्ट्रम पर एजीआर शामिल है, जो रिलायंस जियो ने आरकॉम से 2016 में हासिल किये थे। दूरसंचार विभाग ने 24 अक्टूबर के शीर्ष अदालत के आदेश से सभी टेलीकॉम कंपनियों को तीन महीनों के अंदर खुद आकलन करने और अपना बकाया भुगतान करने के लिए नोटिस भेजे हैं। दूरसंचार विभाग के अधिकारियों का कहना है कि विभाग और कंपनियों की गणना के बीच किसी भी अंतर के मामले में विभाग नया नोटिस भेज देगा।

2016 में जियो ने आरकॉम से की थी डील
2016 में रिलायंस जियो ने एक स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग सौदे में आरकॉम से 800 मेगाहर्ट्ज बैंड में 13 सर्किलों में 45 से अधिक मेगाहर्ट्ज एयरवेव्स खरीदी थी। 2015 के बैंडविड्थ ट्रेडिंग नियमों के मुताबिक विक्रेता से किसी भी सौदे के पूरा होने से पहले पूरी बकाया राशि अदा करने की उम्मीद की जाती है। इसके बाद बकाया के भुगतान की जिम्मेदारी खरीदार की हो जाती है। हालाँकि सौदे के लागू होने के बाद अगर दूरसंचार विभाग को किसी तरह के बकाये का पता चलता है तो वो इसे एक या दोनों पक्षों से वसूल कर सकता है। रिलायंस जियो और आरकॉम का मामला इसी तरह का है।
जियो को देने पड़ सकते है 10,000 करोड़ रुपये
एक अनुमान के मुताबिक इस मामले में आरकॉम के बकाया एजीआर में से जियो को 10,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है। आरकॉम के बकाया 21,140.78 करोड़ रुपये के बकाया एजीआर में लाइसेंस शुल्क, स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क (एसयूसी), जुर्माना और ब्याज शामिल है। बता दें कि इनमें लाइसेंस फीस और एसयूसी का भुगतान एजीआर के आधार पर किया जाता है।
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