नई दिल्ली: वित्त वर्ष 2027 तक देश का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल दोगुना होकर ₹3.30 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। ग्लोबल मार्केट में बढ़ती कीमतों और देश में खेती की बढ़ती जरूरतों की वजह से यह भारी उछाल देखने को मिल रहा है। सब्सिडी में इस बढ़ोतरी से भारत के राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) और अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव पड़ सकता है। अब नीति निर्माताओं के सामने किसानों के हितों की रक्षा और बजट को संतुलित रखने के बीच एक बड़ी चुनौती है।
खेती की लागत को कम रखने के लिए सरकार फिलहाल खाद की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) को कंट्रोल में रखती है। खरीफ सीजन की बुवाई शुरू होने के साथ ही करोड़ों किसानों के लिए यह राहत बहुत जरूरी है। हालांकि, कच्चे माल के आयात की बढ़ती कीमतों के कारण सरकार को इस अंतर की भरपाई खुद करनी पड़ रही है। अगर इसमें संतुलन नहीं बना, तो इसका सीधा असर खाने-पीने की चीजों की महंगाई और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

राजकोषीय घाटे पर दबाव और फर्टिलाइजर सब्सिडी का गणित
सब्सिडी का बोझ बढ़ने से अक्सर सरकार को बजट की कमी पूरी करने के लिए ज्यादा कर्ज लेना पड़ता है। इसका असर सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) और भारतीय रुपये (INR) की वैल्यू पर भी पड़ सकता है। विदेशी निवेशक भारत की आर्थिक स्थिरता को परखने के लिए इन आंकड़ों पर पैनी नजर रखते हैं। घाटा बढ़ने से अन्य जरूरी जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए फंड की कमी भी हो सकती है।
| वित्त वर्ष | अनुमानित सब्सिडी (₹ करोड़) | राजकोषीय जोखिम का स्तर |
|---|---|---|
| FY24 | 1,88,000 | मध्यम |
| FY25 | 1,64,000 | स्थिर |
| FY27 (अनुमानित) | 3,30,000 | अधिक |
इंफ्रास्ट्रक्चर पर असर और सब्सिडी की चुनौतियां
अगर खेती की बढ़ती लागत को संभालने के लिए केंद्रीय फंड का रुख मोड़ा जाता है, तो इसका असर राज्यों की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है। इससे अक्सर ग्रामीण सड़कों और बिजली परियोजनाओं जैसे कैपिटल एक्सपेंडिचर (CAPEX) के बजट में कटौती होती है। भले ही इससे तुरंत अनाज उत्पादन सुरक्षित हो जाए, लेकिन लंबे समय में यह विकास की रफ्तार को धीमा कर सकता है। जानकारों का मानना है कि अब खाद की कीमतों में एक टिकाऊ संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो गया है।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय को इन आर्थिक जोखिमों के बीच खाद की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करनी होगी। यूरिया और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की अंतिम कीमत अभी भी ग्लोबल मार्केट में कच्चे माल के उतार-चढ़ाव पर निर्भर है। भविष्य में कीमतों के झटकों से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कड़े नीतिगत सुधारों की जरूरत होगी। भारत की आर्थिक सेहत के लिए कृषि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना सबसे अहम है।
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