नयी दिल्ली। कोरोनावायरस का प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है। व्यापार ठप्प होते जा रहे हैं, जिसका असर सरकार के राजस्व पर भी पड़ रहा है। केंद्र सरकार को कोरोनोवायरस प्रकोप के चलते एक भारी राजस्व संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसके चलते सरकार ने कम से कम तीन प्रमुख नीतिगत योजनाओं को रोकने का फैसला लिया है। इनमें एक पॉलिसी थी वनस्पति तेलों पर आयात कर को कम करना। बता दें कि केंद्र सरकार कोरोनावायरस की शुरुआत से पहले से ही फाइनेंशियल संकट से जूझ रही है। कोरोनावायरस सरकार की वित्तीय हालत को और बिगाड़ रहा है।

चावल और गेहूं की आपूर्ति बढ़ाने पर रोक
वनस्पति तेलों पर आयात शुल्क के अलावा वित्त मंत्रालय ने खाद्य मंत्रालय के एक और प्रस्ताव को रद्द कर दिया है, जिसके तहत दुनिया के सबसे बड़े कल्याण कार्यक्रम के जरियो लाखों भारतीयों को उच्च सब्सिडी वाले चावल और गेहूं की आपूर्ति बढ़ाने का लक्ष्य था। इसके अलावा वित्त मंत्रालय ने लाखों गरीबों को विटामिन-फोर्टिफाइड चावल देने के लिए खाद्य मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित एक और योजना को भी रद्द कर दिया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार इस योजना पर सरकार का खर्च पांच लाख करोड़ रुपये आता। मगर सरकार को पहले से ही राजस्व का झटका लग रहा है इसलिए ये तीनों योजनाएं रोक दी गयी हैं।
गैर-जरूरी खर्चों पर अंकुश लगाएं
रिपोर्ट के अनुसार वित्त मंत्रालय ने अन्य सभी विभागों / मंत्रालयों को किसी भी नए प्रस्ताव से बचने और गैर-जरूरी खर्चों पर जल्द से जल्द अंकुश लगाने को कहा है। जहां तक सरकार के राजस्व का सवाल है तो चालू वित्त वर्ष के पहले 11 महीनों में सरकार के आयकर राजस्व 3.5 प्रतिशत की गिरावट आयी है। वहीं दूसरी ओर इस सप्ताह संसद में वित्त मंत्रालय के एक जवाब के अनुसार अन्य करों से आय में 3.8 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई है।
इससे पहले जनवरी में खाद्य मंत्रालय ने कच्चे तेल और रिफाइंड वनस्पति तेलों पर आयात कर 3.7 फीसदी तक घटाने का प्रस्ताव रखा था, जिसमें पाम तेल भी शामिल है। इसके जरिये घरेलू कीमतों को नियंत्रण में रखने का लक्ष्य था। हालांकि इस नीति को रोक दिया गया है, क्योंकि इससे सरकार का राजस्व और प्रभावित होगा।
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