नयी दिल्ली। कच्चे तेल की कीमतों में 1991 में हुए खाड़ी युद्ध के सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गयी है। ऐसा सऊदी अरब की तरफ से रूस के साथ प्राइस वॉर शुरू करने के कारण हुआ है। सऊदी अरब ने अपने सेलिंग प्राइस में बड़ी कटौती की है। कोरोनावायरस के कारण कच्चे तेल की मांग घट रही है। ऐसे में सऊदी अरब की योजना कीमतें घटा कर आपूर्ति नियंत्रित करने की है। पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) द्वारा प्रस्तावित उत्पादन में कटौती में बाधा डालने के लिए सऊदी अरब रूस को दंडित करना चाहता है। बता दें कि सऊदी दुनिया का सबसे तेल निर्यातक है। वहीं रूस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है।
कितने घटे हैं कच्चे तेल के दाम
ब्रेंट क्रूड फ्यूचर 14.25 डॉलर या 31.5 फीसदी गिर कर 31.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। ये 17 जनवरी 1991 को शुरू हुए खाड़ी युद्ध के बाद कच्चे तेल की कीमतों में प्रतिशत में सबसे बड़ी गिरावट है। इस भारी गिरावट के साथ कच्चे तेल के दाम 12 फरवरी 2016 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गये हैं। यूएस वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड के दाम 11.28 डॉलर या 27.4 फीसदी गिर कर 30 डॉलर प्रति बैरल पर आ गये। यह भी जनवरी 1991 में खाड़ी युद्ध के बाद प्रतिशत में सबसे बड़ी गिरावट है। वहीं ये 22 फरवरी 2016 के बाद इसका सबसे निचला स्तर है।
पहले भी हुआ है तेल वाले देशों में मुकाबले
सऊदी अरब, रूस, और अन्य प्रमुख तेल उत्पादकों के बीच आखिरी बार 2014 और 2016 के दौरान बाजार हिस्सेदारी को लेकर मुकाबला हुआ था। तब अमेरिका के उत्पादन को कम करने को लेकर प्रयास किये गये थे, जो अब दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। पिछले एक दशक में शेल ऑयल फील्ड से इनफ्लो के चलते अमेरिका का तेल उत्पादन दोगुना हो गया है। इस बीच एक यूरोपीयन ग्रुप ने बयान में कहा है कि सऊदी अरब और रूस के बीच ऑयल प्राइस वॉर सीमित रहने की संभावना है।
भारत को होगा फायदा
सऊदी अरब और रूस के बीच मुकाबले से कच्चे तेल की कीमतों में आयी गिरावट से भारत को फायदा मिलेगा। दरअसल भारत अपनी जरूरत का लगभग 83 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। कच्चे तेल के दाम में इस भारी गिरावट से भारत को करीब 3,000 करोड़ रुपये का लाभ होने की संभावना है। मामले के जानकार कहते हैं कि कच्चे तेल की कीमतें पूरे 2020-21 में दबाव में रहेंगी। कच्चे तेल की कीमतों के 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने की कोई संभावना नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब के कीमतें घटाने के बाद अन्य देश भी कीमतों में कटौती कर सकते हैं।
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