नयी दिल्ली। अगले 3 सालों में बैंकों के 2.54 लाख करोड़ रुपये डूब सकते हैं। दरअसल बैंकों से लिये गये कॉर्पोरेट लोन में से 4 फीसदी पर कंपनियां डिफॉल्ट हो सकती है। यह 4 फीसदी 2.54 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। एक नये अध्ययन के मुताबिक यदि आर्थिक विस्तार की गति पर्याप्त रूप से नहीं बढ़ी तो बैंकों का यह पैसा डूब जायेगा। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च द्वारा शीर्ष 500 निजी क्षेत्र की कंपनियों पर किये गये एक अध्ययन से पता चला है कि वे अपने में से लगभग 10.5 लाख करोड़ रुपये चुकाने में लखखड़ा सकती हैं। रेटिंग फर्म ने अपने क्लाइंटों के लिए ये अध्ययन किया है। इन 500 भारी कर्ज से दबी कंपनियों पर 39.28 लाख करोड़ रुपये का बकाया लोन है। इसमें से मौजूदा डिफ़ॉल्ट की रकम 7.35 लाख करोड़ रुपये है। बैंकिंग सिस्टम में कुल कॉर्पोरेट लोन लगभग 64 लाख करोड़ रुपये का है।
क्रेडिट लागत में 1.37 लाख करोड़ रुपये
2.54 लाख करोड़ रुपये के नये डिफॉल्ट में से 1.37 लाख करोड़ रुपये क्रेडिट लागत में सामने आ सकते हैं, जिससे बैंकों का मुनाफा काफी दबाव में आ जायेगा। वैसे भी भारतीय रिजर्व बैंक के नए नियम के अनुसार एक दिन में ऋण चुकाने में देरी करने वाली कंपनियों को डिफॉल्टर्स माना जाता है। हालांकि डिफ़ॉल्ट का मतलब यह नहीं है कि यह जरूर ही एनपीए में तब्दील हो। किसी खाते को एनपीए तब माना जाता है जब वे 90 दिनों तक लोन न चुकाये। इंडिया रेटिंग्स ने 2016 में इसी तरह का विश्लेषण किया था।
6 फीसदी जीडीपी पर आधारित
इंडिया रेटिंग्स ने डिफॉल्ट होने का यह अनुमान वित्त वर्ष 2021 और 2022 में 6 फीसदी औसत वास्तविक जीडीपी वृद्धि के अनुमान के आधार पर लगाया है। साथ ही यह भी माना गया है कि इनपुट लागत 4% से अधिक नहीं बढ़ेगी और रुपये में 5% से अधिक गिरावट नहीं आयेगी। अगर जीडीपी ग्रोथ 7 फीसदी भी रहे तो भी बैंकों का 1.98 लाख करोड़ रुपये का लोन डूब सकता है। वित्त वर्ष 2019-20 की तीसरी तिमाही के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था 4.7% की दर से बढ़ी। इंडिया रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2020-21 के लिए 5.5% जीडीपी वृद्धि का अनुमान लगाया है।
कौन से सेक्टर अधिक कमजोर
अभी जो सेक्टर सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं, उनमें आयरन एंड स्टील, रेजिडेंशियल रियल एस्टेट, इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (ईपीसी), पारंपरिक पावर जनरेशन और टेलीकॉम शामिल हैं। अध्ययन में कहा गया है कि अगर वित्त वर्ष 2020-21 से 2021-22 में औसत वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 4.5% तक गिरती है, तो बैंकों के कुल लोन में डूबने वाला लोन 159 आधार अंक बढ़ कर 5.59 फीसदी तक जा सकता है।
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