Fitch Ratings: एक सख्त चेतावनी में, फिच रेटिंग्स ने भविष्यवाणी के अनुसार संघर्षों के कारण मिडिल ईस्ट की तेल आपूर्ति में संभावित व्यवधानों की वजह से तेल की कीमतें आपकी सोच से कहीं ज्यादा बढ़ सकती हैं। इतना ही नहीं, ये वैश्विक आर्थिक विकास को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकती हैं और मुद्रास्फीति में वृद्धि का कारण बन सकती हैं।
फिच के ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक (जीईओ) के अनुसार, 2024 मे तेल की औसत कीमत 75 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल और 2025 में 70 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहने की उम्मीद है। तेल की आपूर्ति में प्रतिबंध लगने के कारण यह कीमत साल 2024 में 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है और 2025 में 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती है।

फिच के अनुसार 2025 में अनुमानित मामूली उछाल के बावजूद, शुरुआती झटके से लगातार मध्यम प्रभाव बना रहेगा। तेल की कीमतों में का प्रभाव पूरे विश्व पर महसूस किया जाएगा, 2025 में कुछ खास ग्रोथ ना होने की वजह से इसका असर ज्यादातर देशों के सकल घरेलू उत्पाद यानी (जीडीपी) पर लंबे समय तक रहेगा।
2024 में नेगेटिव ग्रोथ इंपैक्ट, इंडोनेशिया में 0.1 पीपी से लेकर कोरिया में 0.9 पीपी रह सकता है, अमेरिका, यूरोजोन और जापान में भी 0.5 पीपी का असर पड़ सकता है।
दक्षिण अफ्रीका और तुर्की जैसे उभरते बाजार वाले देशों को 0.7 पीपी के असर का सामना करना पड़ सकता है। जबकि रूस और ब्राजील, तेल उत्पादन पर निर्भरता के कारण, अलग-अलग असर पड़ सकता है।
फिच के अनुसार ग्लोबल जीडीपी ग्रोथ मैं 2024 में 0.5 पीपी और 2025 में 0.1 पीपी की गिरावट दर्ज की जा सकती है।
बढ़ती तेल की कीमतों की वजह से भारत, पोलैंड और तुर्की जैसे देश 2024 में सबसे ज्यादा इन्फ्लेशन रेट का सामना कर सकते हैं।
विकसित अर्थव्यवस्था पर भी इसका जबरदस्त असर देखने को मिल सकता है। इसकी वजह से अमेरिका में महंगाई दर फोरकास्ट के मुकाबले 2 पीपी ज्यादा हो सकती है।
वहीं साल 2025 में महंगाई का प्रभाव अल्पकालिक होने और ठीक होने की उम्मीद है। लेकिन ब्राज़ील और मैक्सिको मैं साल के अंत में भी उच्च महंगाई दर बरकरार रह सकती है।
इस रिपोर्ट में बढ़ी हुई तेल की कीमतों का गहरा असर पड़ने पड़ने की बात कही गई है। इसमें टाइट फाइनेंसियल कंडीशन, कम व्यापार के साथ, लो बिजनेस कंज्यूमर कॉन्फिडेंस और वित्तीय बाजारों में सुधार भी शामिल हैं।
2024 की पहली छमाही (1H24) में शेयर की कीमतों में 10 प्रतिशत की गिरावट से एक अधिक गंभीर झटका लग सकता है। बाद में इसका और भी बुरा असर पड़ सकता है, जिससे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अगले साल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 0.5 पीपी से 0.9 पीपी तक कम हो सकती है।
फिच ने इस बात पर प्रकाश डाला कि अपेक्षा से अधिक तेल की कीमतें कई बात पर निर्भर करेंगी, जिनमें सार्वजनिक वित्त के परिणाम, बाहरी वित्त, सार्वजनिक वित्त, ऊर्जा निर्यातकों और आयातकों का संतुलन शामिल हैं।
यह स्थिति वैश्विक आर्थिक परस्पर निर्भरता के जटिल जाल और तेल उत्पादक क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव से उत्पन्न होने वाली संभावित कमजोरियों को बताती है।
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