नई दिल्ली। देश की जीडीपी लगातार 5 तिमाहियों से घट रही है और चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह गिरकर 5 फीसदी पर आ गई है। इसका साफ संकेत है कि देश की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में जा रही है। हालांकि इसमें कुछ प्रभाव अमेरिका और चीन के बची चल रहे ट्रेड वॉर का भी माना जा रहा है। लेकिन कुल मिलाकर हालात अच्छे नहीं है। वैसे देश में इससे पहले भी मंदी का दौर आ चुका है। मुख्यता देश 2 बार मंदी को झेल चुका है।

देश का वित्तीय हाल अच्छा नहीं
देश में जुलाई में कारों और दो पहिया वाहनों की बिक्री में 31 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। इसके चलते ऑटो सेक्टर में साढ़े तीन लाख से ज्यादा नौकरियां चली गईं और करीब 10 लाख पर खतरे की तलवार है। सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले कपड़ा उद्योग भी खराब दौर से गुजर रहा है।
इससे पहले कब कब आई मंदी
आजादी के बाद से भारत को 2 बार आर्थिक मंदी का दौर आ चुका है। पहली बार साल 1991 और फिर 2008 में। जहां साल 1991 में आई आर्थिक मंदी के पीछे अंदरूनी कारण थे, वहीं 2008 में वैश्विक मंदी का कारण ग्लोबल था। 1991 में भारत के आर्थिक संकट में फंसने की सबसे बड़ी वजह भुगतान संतुलन की गड़बड़ी थी। उस समय देश का व्यापार संतुलन गड़बड़ा चुका था। सरकार बड़े राजकोषीय घाटे पर चल रही थी। खाड़ी युद्ध में 1990 के अंत तक स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी, कि भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल से तीन सप्ताह के आयात का बचा था।
सोना गिरवी रखना पड़ा था
उस समय विदेशी मुद्रा भंडार घटने से रुपये में तेज गिरावट का दौर आया था। उस समय सरकार ने फरवरी 1991 बजट पेश नहीं किया था। इसी दौरान अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की रेंकिंग को डाउनग्रेड कर दिया था। विश्व बैंक और आईएमएफ ने भी मदद रोक दी थी। ऐसे में सरकार को भुगतान पर चूक से बचने के लिए देश का सोना गिरवी रख कर संकट से मुकाबला किया था।
2008 की मंदी को आसानी से झेल गया था भारत
भारत 2008 में आई आर्थिक मंदी को आसानी से झेल गया था। उस समय देश की अर्थव्यस्था को उतना नुकसान नहीं हुआ था, जितनी बड़ी यह ग्लोबल मंदी थी। अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं काफी नुकसान उठाना पड़ा था।
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