30 सितंबर की टैक्स ऑडिट डेडलाइन में अब महज 12 दिन बाकी हैं और 18 सितंबर 2026 तक सीबीडीटी (CBDT) ने तारीख बढ़ाने को लेकर कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है। नॉन-ट्रांसफर प्राइजिंग मामलों में टैक्स ऑडिट रिपोर्ट दाखिल करने की आखिरी तारीख 30 सितंबर है, जबकि इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) 31 अक्टूबर तक भरा जा सकता है। वहीं, ट्रांसफर प्राइजिंग से जुड़े मामलों में ऑडिट रिपोर्ट 31 अक्टूबर और रिटर्न 30 नवंबर तक जमा करना अनिवार्य है। ऐन मौके पर पोर्टल पर ट्रैफिक बढ़ने और दोबारा काम करने की झंझट से बचने के लिए अभी से फाइलिंग पूरी कर लें।
इनकम टैक्स एक्ट की धारा 44AB के तहत आखिर टैक्स ऑडिट कराना किसके लिए जरूरी है? अगर आपके बिजनेस का टर्नओवर ₹1 करोड़ से ज्यादा है, या फिर कैश लेनदेन (प्राप्ति और भुगतान दोनों) 5 फीसदी से कम होने पर ₹10 करोड़ से अधिक है, तो ऑडिट कराना होगा। वहीं, पेशेवरों (Professionals) के लिए ग्रॉस रीसिट ₹50 लाख से ऊपर जाने पर ऑडिट जरूरी है। इसके अलावा, जो टैक्सपेयर्स प्रिजम्पटिव टैक्सेशन के तहत तय सीमा से कम मुनाफा दिखाते हैं और जिनकी आय बेसिक छूट सीमा से ज्यादा है, वे भी इसके दायरे में आते हैं। इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले अपने कैश लेनदेन और प्रिजम्पटिव क्लेम की अच्छे से जांच कर लें।

30 सितंबर टैक्स ऑडिट डेडलाइन: पोर्टल पर फाइलिंग का तरीका और रिजेक्शन से बचने के टिप्स
फाइलिंग के लिए सबसे पहले अपने इनकम टैक्स पोर्टल में जाकर चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) को असाइन करें। इसके बाद, सीए फॉर्म 3CD के साथ फॉर्म 3CA या 3CB अपलोड करेंगे और उसे DSC या OTP के जरिए साइन करेंगे। प्रक्रिया पूरी करने के लिए आपको अपनी वर्कलिस्ट (Worklist) में जाकर इसे स्वीकार (Accept) करना होगा। पोर्टल यूनिक डॉक्यूमेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर (UDIN) को ऑटो-वैलिडेट करता है। अगर तय समय सीमा के भीतर सही UDIN दर्ज नहीं किया गया, तो ICAI ऐसे फॉर्म को अमान्य मान लेता है। अक्सर गलत असेसमेंट ईयर चुनना, एक्सपायर्ड DSC और वर्कलिस्ट में फाइलिंग एक्सेप्ट न करना जैसी वजहों से फॉर्म रिजेक्ट हो जाते हैं।
धारा 44AB चेकलिस्ट: GST बिक्री, AIS का ब्याज, 26AS का TDS, स्टॉक और डेरिवेटिव्स
अपनी बुक्स ऑफ अकाउंट्स, जीएसटी रिटर्न और दिखाए गए टर्नओवर का सही मिलान करें। इसके साथ ही फॉर्म 26AS से टैक्स क्रेडिट और प्री-फिल डेटा को रीकंसाइल करना न भूलें। बैंक ब्याज, डिविडेंड और टैक्स रिफंड पर मिले ब्याज का ब्योरा जानने के लिए एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) देखें और उसी आधार पर साल के अंत की एंट्रीज पूरी करें। यह भी पक्का कर लें कि क्लॉज 44 के तहत जीएसटी खर्चों का ब्रेकअप वेंडर स्टेटस और आपके बही-खातों से मेल खाता हो। ऑडिट की प्रक्रिया आसान बनाने और सीए के सवालों की झंझट से बचने के लिए अपनी वर्किंग्स, लेजर, कन्फर्मेशन और GST व AIS रीकंसिलेशन पहले से तैयार रखें।
ओल्ड बनाम न्यू टैक्स रिजीम: समझें अंतर और सैलरी के उदाहरण से गणित
| फीचर्स | ओल्ड टैक्स रिजीम | न्यू टैक्स रिजीम (धारा 115BAC) |
|---|---|---|
| बेसिक टैक्स फ्री लिमिट (Nil Rate) | ₹2.5 लाख तक | ₹4 लाख तक |
| स्टैंडर्ड डिडक्शन | ₹50,000 | ₹75,000 |
| आम डिडक्शन्स (छूट) | चैप्टर VI-A की ज्यादातर छूट लागू | सीमित छूट उपलब्ध |
| धारा 87A के तहत रिबेट | ₹12,500 तक (आय ≤ ₹5 लाख) | ₹60,000 तक (आय ≤ ₹12 लाख) |
टैक्स कैलकुलेशन का आसान उदाहरण: मान लीजिए आपकी सालाना सैलरी ₹12.5 लाख है। न्यू टैक्स रिजीम में ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलने के बाद आपकी टैक्सेबल इनकम ₹11.75 लाख रह जाती है। इस पर बनने वाला स्लैब टैक्स ₹60,000 की रिबेट से पूरी तरह एडजस्ट हो जाता है, यानी आपको शून्य टैक्स देना होगा। वहीं, ओल्ड टैक्स रिजीम में ₹50,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन घटाने के बाद ₹12 लाख टैक्सेबल आय बचती है, जिस पर सेस मिलाकर लगभग ₹1.79 लाख का टैक्स बनेगा। हालांकि, आपके लिए कौन सा विकल्प बेहतर है, यह आपकी कुल टैक्स छूट (Deductions) पर निर्भर करता है।
अगर फाइलिंग के दौरान कोई गलती हो जाए, तो उसे तुरंत ठीक करें। डेडलाइन खत्म होने से पहले फॉर्म 3CD को रिवाइज करके दोबारा सबमिट कर दें। तय तारीख तक फाइलिंग न करने पर धारा 271B के तहत पेनाल्टी लग सकती है, जो कुल टर्नओवर या रीसिट का 0.5 फीसदी या अधिकतम ₹1.5 लाख तक हो सकती है। हालांकि, अगर देरी की कोई उचित वजह है, तो आप अपने जवाब में धारा 273B के तहत राहत की मांग कर सकते हैं। इसलिए इस वीकेंड ही अपने बही-खाते फाइनल करें, GST और AIS रीकंसिलेशन निपटाएं, और UDIN व फाइलिंग एक्सेप्टेंस का काम पूरा कर लें। साथ ही सीबीडीटी के ताजा अपडेट्स पर नजर बनाए रखें।


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