Sovereign gold bonds vs physical gold: गोल्ड की जब भी बात आती है तो निवेशकों के मन में खुशी की लहर देखने को मिलती है। सोना एक कीमती धातु के साथ सेफ और भरोसेमंद विकल्प भी है। हाल के समय में देखें तो सोने के भाव में भारी उछाल आया है जिसने यह साबित कर दिया है कि यह निवेश पोर्टफोलियो में शामिल करना जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि सोने में निवेश करने का सबसे सही तरीका क्या है, फिजिकल गोल्ड या सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGBs)?

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGBs) के फायदे
SGBs भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए जाते हैं और इन्हें बैंक या ब्रोकर के माध्यम से खरीदा जा सकता है।
निवेशकों को हर साल 2.5% तय ब्याज मिलता है।
सोने की कीमत में बढ़ोतरी पर ज्यादा फायदे मिलते हैं।
8 साल तक रखने पर कैपिटल गेन टैक्स से छूट मिलती है।
चोरी या स्टोरेज की चिंता नहीं रहती क्योंकि ये डिजिटल फॉर्म में होते हैं।
सेकेंडरी मार्केट में बेचने की सुविधा भी होती है।
फिजिकल गोल्ड की खूबियां और सीमाएं
सोना कॉइन, बार या ज्वेलरी के रूप में खरीदा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत बेचा जा सकता है।
लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं:
खरीदते समय मेकिंग चार्ज, GST और प्रोसेसिंग फीस देना पड़ता है।
लंबे समय तक रखने पर स्टोरेज और सुरक्षा की समस्या रहती है।
इसमें केवल सोने की कीमत बढ़ने पर ही फायदा होता है, कोई अतिरिक्त रिटर्न नहीं।
निवेश के लिए ध्यान देने योग्य बातें
अगस्त 2025 तक बड़े शहरों में 24 कैरेट सोने की औसत कीमत लगभग ₹10,244 प्रति ग्राम रही।
SGBs ने अब तक 240% से अधिक का कुल रिटर्न दिया है।
फिजिकल गोल्ड तुरंत लिक्विड है, लेकिन टैक्स और चार्जेज की वजह से वास्तविक रिटर्न कम हो जाता है।
लंबे समय के निवेश और टैक्स बचत के लिए SGBs अधिक फायदेमंद विकल्प हैं।
अगर निवेशक अल्पकालिक जरूरतों के लिए सोना खरीदना चाहते हैं, तो फिजिकल गोल्ड सही रहेगा। लेकिन अगर टारगेट लंबे समय में सुरक्षित निवेश और ज्यादा फायदा है, तो SGBs बेहतर विकल्प साबित होंगे।
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