14 अक्टूबर दोपहर 3:51 बजे (IST), पिछले तीन दिनों की रिकवरी के बाद रुपया प्रति डॉलर 95 के स्तर के करीब बना रहा। दिन के कारोबार में डॉलर/रुपया (USD/INR) 94.76 से 95.19 के दायरे में रहा। दरअसल, वीकेंड पर आरबीआई (RBI) की ओर से उठाए गए सख्त कदमों से डॉलर की मांग थोड़ी सुस्त पड़ी और सट्टेबाजी पर भी ब्रेक लगा। हफ्ते भर का यह उतार-चढ़ाव शॉर्ट-टर्म कैश पार्किंग के लिहाज से बेहद अहम है, क्योंकि बाजार में अस्थिरता बढ़ते ही शॉर्ट-टर्म यील्ड, फॉरेक्स से जुड़े लक्ष्य और टैक्स के बाद मिलने वाले रिटर्न का गणित बदल जाता है।
क्या बदला मामला? आरबीआई ने सरकारी तेल कंपनियों के लिए एक स्पेशल डॉलर विंडो खोली, डेरिवेटिव्स के डॉक्युमेंटेशन नियम सख्त किए और सट्टेबाजी रोकने के लिए कैश-मार्जिन जरूरतें बढ़ा दीं। गवर्नर ने साफ संकेत दिए हैं कि करेंसी मार्केट में स्थिरता बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक आगे भी कदम उठाने को तैयार है। आने वाले दिनों में रुपये को सहारा मिलने की उम्मीद तो है, लेकिन आयातकों की हेजिंग और विदेशी फंड्स की निकासी पर कड़ी नजर रखनी होगी।

FD vs T‑Bills vs लिक्विड/आर्बिट्राज फंड
14 अक्टूबर तक यील्ड का हाल: 91-दिन वाले T-bill का कट-ऑफ 5.73 फीसदी, 182-दिन वाले का 6.29 फीसदी और 364-दिन वाले का 6.49 फीसदी के करीब रहा। वहीं, बड़े बैंकों में 1 साल से कम की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर औसतन 6.3 से 7.4 फीसदी ब्याज मिल रहा है, जबकि कुछ गिने-चुने बैंक इससे भी ज्यादा रिटर्न दे रहे हैं। रेगुलर लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए आप 1, 3, 6 और 9 महीनों की FD का लैडरिंग ऑप्शन चुन सकते हैं। सीनियर सिटीजन्स को आमतौर पर 0.5 से 0.75 फीसदी तक का अतिरिक्त ब्याज मिल रहा है।
| इंस्ट्रूमेंट | सांकेतिक यील्ड (14 अक्टू) | लिक्विडिटी | टैक्स नियम |
|---|---|---|---|
| सेविंग्स अकाउंट | 3.0–5.0% | तुरंत (Instant) | ब्याज पर टैक्स स्लैब के हिसाब से लगेगा |
| बैंक FD (3–12 महीने) | 6.3–7.4%+ | समय से पहले निकालने पर जुर्माना | ब्याज पर टैक्स स्लैब के हिसाब से लगेगा |
| T‑Bills 91/182/364‑दिन | 5.73/6.29/6.49% | T+1 सेटलमेंट, ट्रेडेबल | आमतौर पर शॉर्ट-टर्म; स्लैब रेट से टैक्स |
| लिक्विड/मनी‑मार्केट फंड्स | ~6.4–6.8% (ट्रेलिंग) | T+1; शुरुआती 7 दिनों में ग्रेडेड एग्जिट लोड | डेट-फंड मुनाफे पर टैक्स स्लैब के हिसाब से |
| आर्बिट्राज फंड्स (1 साल की होल्डिंग) | ~6.5–6.8% | T+3 | STCG 20%; LTCG 12.5% (₹1.25 लाख तक की छूट के साथ) |
कैटेगरी के हिसाब से देखें तो मनी-मार्केट और लिक्विड फंड्स फिलहाल 6.5 फीसदी के आसपास रिटर्न दे रहे हैं। निवेश से पहले इनका 7-दिन और 1-साल का ट्रेलिंग रिटर्न जरूर चेक कर लें। ध्यान रखें कि 7 दिनों के भीतर पैसा निकालने पर सेबी (SEBI) का ग्रेडेड एग्जिट लोड लगता है। हाल ही में आर्बिट्राज फंड्स ने एक साल में करीब 6.5 से 6.8 फीसदी का रिटर्न दिया है और इनमें इक्विटी जैसी टैक्स छूट का फायदा मिलता है। हालांकि, 1 साल से कम की होल्डिंग पर 20 फीसदी का शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) टैक्स लागू होगा।
डॉलर से जुड़े लक्ष्य: रेमिटेंस और हेजिंग की रणनीति
अगर आपको जल्द ही विदेश में खर्च करना है, तो आरबीआई की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत फंड ट्रांसफर की टाइमिंग सही रखें। इस स्कीम में प्रति व्यक्ति हर वित्तीय वर्ष 2,50,000 डॉलर तक भेजने की छूट है। विदेशी मुद्रा रखने वाले एनआरआई (NRI) चाहें तो भारत में टैक्स-फ्री 6.5 से 7.4 फीसदी ब्याज देने वाली NRE FD और चुनिंदा बैंकों में 7.1 फीसदी तक का रिटर्न देने वाली FCNR (USD) डिपॉजिट की तुलना कर सही विकल्प चुन सकते हैं।
अगर आप मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में दिलचस्पी रखते हैं, तो भारत में लिस्टेड यूएस ट्रेजरी फंड-ऑफ-फंड्स के जरिए अमेरिकी दरों का फायदा ले सकते हैं, हालांकि इनकी NAV रुपये में तय होती है। करेंसी-डेनॉमिनेटेड IFSC फंड्स इससे अलग हैं। अपने पोर्टफोलियो को रुपये की गिरावट से बचाने के लिए घरेलू गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) बेहतरीन जरिया हैं, जो रुपये में गिरावट के समय ऐतिहासिक रूप से सुरक्षा देते आए हैं। वहीं, 6 महीने से कम समय के लिए पैसा पार्क करना हो, तो मार्क-टू-मार्केट (MTM) के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए लॉन्ग-ड्यूरेशन या क्रेडिट-रिस्क डेट फंड्स से दूरी बनाएं।


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