16 सितंबर 2026 को हुए आरबीआई (RBI) के टी-बिल (T-Bill) ऑक्शन ने शॉर्ट-टर्म यील्ड को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। नई कट-ऑफ दरों की बात करें तो 91-दिन के लिए यह 5.28%, 182-दिन के लिए 5.75% और 364-दिन के लिए 6.04% रही है। अगर आप भी अगले 5 से 12 महीनों के लिए अपना पैसा सुरक्षित जगह निवेश करने की सोच रहे हैं, तो यह खबर आपके काम की है। अब सवाल यह उठता है कि क्या टी-बिल रिटर्न के मामले में लिक्विड फंड्स या शॉर्ट-टर्म एफडी (FD) को पीछे छोड़ रहे हैं? इसका सही जवाब आपके टैक्स स्लैब, खर्चों, पैसों की जरूरत और निकासी की सहूलियत पर निर्भर करता है।
टी-बिल पूरी तरह से सरकारी गारंटी (Sovereign Guarantee) के साथ आते हैं। इन्हें डिस्काउंट पर बेचा जाता है और मैच्योरिटी पर पूरी वैल्यू मिलती है। दूसरी तरफ, लिक्विड या अल्ट्रा-शॉर्ट फंड्स जोखिम को बांटते जरूर हैं, लेकिन वे एक्सपेंस रेशियो वसूलते हैं और जल्द पैसे निकालने पर एग्जिट लोड भी लगा सकते हैं। वहीं शॉर्ट-टर्म एफडी में तय ब्याज दर और सादगी मिलती है, लेकिन समय से पहले पैसे निकालने पर पेनल्टी देनी पड़ती है। टैक्स के लिहाज से तीनों ही आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से आते हैं, इसलिए आज की तारीख में आपके लिए कौन सा ऑप्शन बेस्ट है, यह लागत और लिक्विडिटी तय करती है।

T‑Bills बनाम लिक्विड फंड्स बनाम शॉर्ट एफडी: टैक्स के बाद का गणित
| अवधि (Tenor) | कट‑ऑफ यील्ड | ऑक्शन की तारीख |
|---|---|---|
| 91‑दिन | 5.28% | 16 सितंबर 2026 |
| 182‑दिन | 5.75% | 16 सितंबर 2026 |
| 364‑दिन | 6.04% | 16 सितंबर 2026 |
अपना पैसा शिफ्ट करने से पहले टैक्स के बाद मिलने वाले रिटर्न का हिसाब जरूर लगा लें। आप चाहें नई टैक्स व्यवस्था (Section 115BAC) में हों या पुरानी में, अपने टैक्स स्लैब के हिसाब से तुलना करें। टी-बिल में डिस्काउंट से होने वाले फायदे पर स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है; म्यूचुअल फंड्स खर्च काटने के बाद बची कमाई पर टैक्स लेते हैं; वहीं एफडी में तय ब्याज दर पर टैक्स देना होता है। अगर टैक्स से पहले का रिटर्न बराबर हो, तो कम लागत वाला विकल्प ही बाजी मारता है। उदाहरण के लिए, 364-दिन के टी-बिल की मौजूदा 6.04% दर पर 30% टैक्स स्लैब वाले निवेशक को टैक्स के बाद लगभग 4.23% का शुद्ध रिटर्न मिलेगा।
| निवेश विकल्प | टैक्स से पहले की दर | टैक्स का आधार | टैक्स के बाद का फॉर्मूला | उदाहरण (30% स्लैब) |
|---|---|---|---|---|
| 364‑दिन T‑Bill | 6.04% कट‑ऑफ | स्लैब दर | दर × (1 − टैक्स रेट) | ≈4.23% |
| लिक्विड/अल्ट्रा‑शॉर्ट फंड | T‑Bill रिटर्न घटा खर्च | स्लैब दर | (रिफरेंस दर − खर्च) × (1 − टैक्स) | रेफरेंस पर निर्भर |
| शॉर्ट एफडी (5–12 महीने) | मान लीजिए 6.50% (उदाहरण) | स्लैब दर | FD दर × (1 − टैक्स) | ≈4.55% |
अब T‑Bills कैसे खरीदें?
आरबीआई रिटेल डायरेक्ट (RBI Retail Direct) पोर्टल पर जाकर अपने पैन (PAN), आधार, ईमेल, मोबाइल नंबर और बैंक अकाउंट की मदद से रजिस्टर करें। इसके बाद ई-केवाईसी (e-KYC) पूरा करें, नॉमिनी जोड़ें और प्राइमरी बिडिंग ऑप्शन चालू करें। अब T-Bills सेक्शन में जाकर अपनी पसंद की अवधि (tenor) चुनें और नॉन-कंपिटिटिव बिड (non-competitive bid) लगाएं। इसका भुगतान नेट बैंकिंग या यूपीआई (UPI) से किया जा सकता है। आमतौर पर अलॉटमेंट और टी-बिल क्रेडिट अगले वर्किंग डे तक पूरा हो जाता है। अगर आप मैच्योरिटी से पहले निकलना चाहते हैं, तो आपको इसे सेकेंडरी मार्केट में बेचना होगा। इसके अलावा, आप अपने ब्रोकर ऐप का इस्तेमाल करके डीमैट अकाउंट और गिल्ट सेगमेंट के जरिए भी टी-बिल में निवेश कर सकते हैं। बस ऐप में T-Bills सर्च करें, प्राइस और यील्ड चेक करें, ऑर्डर प्लेस करें और पेमेंट पूरा करें।
भारतीय निवेशकों के लिए T‑Bills कितने सही? इन बातों का रखें ध्यान
नौकरीपेशा लोगों के लिए 1 साल से कम समय के तय वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए टी-बिल एक बेहतरीन जरिया हैं। वहीं, रिटायर्ड लोग बेहतर विजिबिलिटी के लिए अलग-अलग अवधि वाले टी-बिल (laddering) चुन सकते हैं, साथ ही इमर्जेन्सी फंड के तौर पर कुछ पैसा लिक्विड फंड्स में रख सकते हैं। छोटे और मध्यम कारोबारी (SMEs) भी अपने खाली पड़े कैश को बिलिंग साइकिल के बीच सही जगह लगाने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। जब भी टैक्स और लागत काटने के बाद टी-बिल का रिटर्न एफडी या लिक्विड फंड्स से बेहतर मिले, तब इसमें स्विच करना फायदेमंद होता है। हालांकि, री-इन्वेस्टमेंट रिस्क (पुनर्निवेश जोखिम) और मार्केट लिक्विडिटी का ध्यान जरूर रखें। इसके अलावा, लिक्विड फंड्स से जल्दी निकासी पर लगने वाले एग्जिट लोड और एक्सपेंस रेशियो का हिसाब लगाना न भूलें।


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