भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार, 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया है। फरवरी 2023 के बाद पहली बार हुई इस बढ़ोतरी के साथ ही केंद्रीय बैंक ने अपना पॉलिसी रुख बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया है। इस फैसले के बाद रेपो रेट से जुड़े लोन की EMI अगली रीसेट डेट पर बढ़ जाएगी। फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की दरों में भी कुछ समय बाद बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि फिलहाल अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के लिए स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स की ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
यह फैसला क्यों अहम है: एक्सटर्नल बेंचमार्क से जुड़े लोन की दरें सीधे तौर पर पूरी तरह बढ़ती हैं। नियम के मुताबिक RBI बैंकों के लिए हर तीन महीने में कम से कम एक बार दरें रीसेट करना अनिवार्य बनाता है, हालांकि कई बड़े बैंक हर महीने या तिमाही आधार पर रीसेट साइकिल चलाते हैं। वहीं, MCLR से जुड़े लोन की दरें सिर्फ अपनी रीसेट डेट पर ही बदलती हैं, जो अक्सर 6 या 12 महीने में आती है। इसके अलावा रिजर्व बैंक गवर्नर ने साफ संकेत देते हुए कहा कि "निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की कोई संभावना नहीं है।"

EMI, EBLR बनाम MCLR: अब आपके लिए क्या बदलेगा
अब आपकी रणनीति क्या होनी चाहिए: अगर आपकी रीसेट डेट पेंडिंग है, तो बैंक से तुरंत रेट रीसेट करने की गुजारिश करें। आप पुरानी EMI के साथ लोन की अवधि (Tenure) बढ़ाने या फिर अवधि वही रखकर बढ़ी हुई EMI देने का विकल्प चुन सकते हैं। अगर लोन की अवधि लंबी बची है, तो शुरुआती दौर में ही प्री-पेमेंट करना समझदारी होगी। रीफाइनेंस का फैसला तभी लें जब आपका स्प्रेड ज्यादा हो और लोन ट्रांसफर का खर्च कम आ रहा हो। कोई भी फैसला लेने से पहले अपने बैंक का रीसेट कैलेंडर और EMI कैलकुलेटर जरूर चेक करें। सबसे पहले क्रेडिट कार्ड EMI और Buy Now Pay Later (BNPL) जैसे महंगे कर्ज बंद करें, क्योंकि इन पर अक्सर 36-48% तक की भारी सालाना ब्याज दर (APR) होती है। आइए देखें कि 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी से प्रति ₹1 लाख के लोन पर अवधि के हिसाब से आपकी EMI पर कितना असर पड़ेगा (अनुमानित):
| अवधि (Tenor) | प्रति ₹1 लाख पर बढ़ी हुई मासिक EMI (₹) |
|---|---|
| 5 साल | 12 |
| 7 साल | 13 |
| 10 साल | 14 |
| 15 साल | 15 |
| 20 साल | 16 |
RBI की बढ़ोतरी के बाद डिपॉजिटर्स, FD और स्मॉल सेविंग्स पर असर
डिपॉजिटर्स को सलाह दी जाती है कि वे 6-9 महीने, 1-2 साल और 3-5 साल की अलग-अलग अवधि में 'FD लैडरिंग' करें। इससे भविष्य में दरें बढ़ने का फायदा उठाने का मौका मिलेगा और रीइन्वेस्टमेंट का रिस्क भी कम होगा। ब्लाइंड ऑटो-रिन्यूअल की बजाय स्वीप-आउट विकल्प चुनें ताकि ज्यादा ब्याज वाले नए स्लैब का लाभ मिल सके। फिलहाल बड़े बैंक चुनिंदा अवधियों पर 6.5 से 7.5 प्रतिशत तक का ब्याज ऑफर कर रहे हैं। नीतिगत बदलावों के कुछ समय बाद ही जमा दरों में बढ़ोतरी का असर दिखता है।
| अवधि (Tenor) | 7.0% पर FD (₹1 लाख बढ़कर होगा) | 7.5% पर FD (₹1 लाख बढ़कर होगा) |
|---|---|---|
| 5 साल | 140,255 | 143,563 |
| 10 साल | 196,715 | 206,103 |
| 15 साल | 275,903 | 295,888 |
RBI के फैसले के बाद डेट म्यूचुअल फंड्स की स्थिति
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से अल्पावधि में डेट फंड्स की NAV पर दबाव आ सकता है, लेकिन आगे चलकर कैरी यील्ड में सुधार होगा। लॉन्ग-ड्यूरेशन और गिल्ट फंड्स पर दरों में बढ़ोतरी का ज्यादा असर पड़ता है, जबकि शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड्स कम अवधि के लक्ष्यों के लिए सही रहते हैं। अगर आप निवेश की अवधि को फंड की मैच्योरिटी से मिला सकते हैं, तो टारगेट-मैच्योरिटी स्ट्रैटेजी मददगार हो सकती है। निवेश से पहले क्रेडिट क्वालिटी और खर्चों की दोबारा जांच करें। याद रखें कि 2023 के बाद लागू नए नियमों ने डेट फंड्स के टैक्स स्ट्रक्चर को भी बदल दिया है।


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