भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 5 से 7 अक्टूबर के बीच हो रही है, जिसका फैसला शनिवार 7 अक्टूबर को आएगा। अगस्त में राहत के बाद फिलहाल रेपो रेट 5.25 फीसदी पर है, लेकिन ज्यादातर इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि इस बार इसमें 0.25 फीसदी (25 बेसिस प्वाइंट) की बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में निवेशकों के पास इस हफ्ते फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), ट्रेजरी बिल्स (T-bills) या डेट फंड्स में से सही ऑप्शन चुनने का सीमित मौका है।
शनिवार से पहले चुनिंदा अवधि (Slabs) में पैसा लॉक करके आप मौजूदा ब्याज दरों का फायदा उठा सकते हैं। HDFC बैंक जैसे बड़े बैंक 1 से 2 साल की सीनियर सिटीजन FD पर 6.75 फीसदी तक ब्याज दे रहे हैं, वहीं स्मॉल फाइनेंस बैंक 7.90 फीसदी तक का रिटर्न दे रहे हैं। 91-दिन वाले हालिया T-bill की कट-ऑफ 5.2 से 5.4 फीसदी के आसपास रही है। सरकारी विकल्पों की बात करें तो RBI फ्लोटिंग रेट बॉन्ड्स 8.05 फीसदी और सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) 8.2 फीसदी ब्याज की पेशकश कर रहे हैं।

FD बनाम डेट फंड्स बनाम T-bills: रिटर्न और टैक्स का गणित
| निवेश का जरिया | अनुमानित रिटर्न/ब्याज | टैक्स और लिक्विडिटी |
|---|---|---|
| HDFC बैंक FD (1–2 साल, सीनियर सिटीजन) | 6.75% | टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स; समय से पहले निकासी पर 1% पेनाल्टी |
| AU स्मॉल फाइनेंस बैंक FD (सीनियर सिटीजन) | Up to 7.90% | टैक्स स्लैब के मुताबिक टैक्स; पेनाल्टी शर्तें जरूर देखें |
| 91‑दिन का T‑bill (ऑक्शन) | ~5.2–5.4% | टैक्स स्लैब के मुताबिक टैक्स; हर हफ्ते ऑक्शन |
| लिक्विड फंड्स (उदाहरण) | ~6.4–6.6% YTM | 1 अप्रैल 2023 के बाद खरीदी गई यूनिट्स पर इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स |
| RBI फ्लोटिंग रेट बॉन्ड्स | 8.05% (Jul–Dec ’26) | टैक्स योग्य; 7 साल का लॉक-इन पीरियड |
| सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम | 8.2% | टैक्स योग्य; हर तिमाही भुगतान |
निवेश करते समय सिर्फ ब्याज दर ही नहीं, बल्कि टैक्स और जरूरत पड़ने पर पैसा निकालने (लिक्विडिटी) की सुविधा को देखना भी जरूरी है। 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद खरीदे गए डेट म्यूचुअल फंड पर होल्डिंग पीरियड की परवाह किए बिना आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से ही टैक्स लगता है। वहीं HDFC बैंक में समय से पहले FD तोड़ने पर 1 फीसदी की पेनाल्टी लगती है। T-bill से होने वाली कमाई पर भी स्लैब रेट के अनुसार ही टैक्स देना होता है। अपने इन-हैंड रिटर्न का अंदाजा लगाने के लिए इंटरेस्ट रेट को (1 - टैक्स स्लैब) से गुणा कर सकते हैं।
डेट म्यूचुअल फंड्स: YTM, ड्यूरेशन और टारगेट-मैच्योरिटी समझें
विभिन्न कैटेगरी का रिटर्न देखकर समझ आता है कि कई निवेशक FD के मुकाबले फंड्स को तरजीह क्यों दे रहे हैं। लिक्विड फंड्स लगभग 6.4–6.6 फीसदी YTM दे रहे हैं, जबकि अल्ट्रा-शॉर्ट ड्यूरेशन फंड्स का रिटर्न 7 फीसदी के करीब है। टारगेट-मैच्योरिटी फंड्स मौजूदा सरकारी और PSU यील्ड के हिसाब से तय होते हैं; हाल ही में 10-वर्षीय बेंचमार्क यील्ड 7.19 फीसदी के आसपास रही। अगर RBI रेपो रेट बढ़ाता है, तो लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड्स में मार्क-टू-मार्केट जोखिम रहता है, जबकि अल्ट्रा-शॉर्ट फंड्स इस नुकसान से बचाते हैं।
आगे क्या करें: लेडरिंग स्ट्रेटजी और T-bills में बोली लगाने का तरीका
निवेश के लिए आप 30-60-90 दिनों की 'कैश लेडरिंग' रणनीति अपना सकते हैं। इसमें अपनी रकम का एक तिहाई हिस्सा 1-3 महीने की FD में, एक तिहाई 91-दिन के T-bills में और बाकी एक तिहाई लिक्विड या अल्ट्रा-शॉर्ट फंड में लगा सकते हैं। T-bills में निवेश के लिए आप NSE goBID या RBI रिटेल डायरेक्ट के जरिए बोली लगा सकते हैं; नॉन-कंपैटिटिव और ऑटो-बिडिंग प्रोसेस से काम आसान हो जाता है। वहीं, सीनियर सिटीजन्स सबसे पहले SCSS, फिर RBI फ्लोटिंग रेट बॉन्ड्स और फ्लेक्सिबिलिटी के लिए FD में निवेश को प्राथमिकता दे सकते हैं।


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