RBI MPC Meet: मिडिल क्लास को मिली एक और राहत! रिजर्व बैंक ने घटाई ब्याज दरें, कम होगा ईएमआई का बोझ?

RBI MPC Meet: मिडिल क्लास के लिए साल 2025 राहत की खबर लेकर आया है. पहले केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 12 लाख रुपए तक की सालाना इनकम को टैक्स फ्री करने का ऐलान किया. अब रिजर्व बैंक की मौद्रीक समीक्षा कमिटी यानी एमपीसी मीटिंग में ब्याज दरें घटाने का ऐलान हुआ है. इसके तहत ब्याज दरों को अनुमान के मुताबिक 25 बेसिस पॉइंट्स घटा दिया गया है.

फरवरी पॉलिसी में ब्याज दरों में कटौती के चलते अब रेपो रेट घटकर 6.25 फीसदी पर आ गया है. मौद्रीक समीक्षा कमिटी के सभी 6 सदस्यो ने ब्याज दरों में कटौती के पक्ष में वोट दिया. साथ न्यूट्रल स्टांस रखा है.

5 साल बाद मिली खुशखबरी

ब्याज दरों में यह फरवरी 2023 की पॉलिसी मीटिंग के बाद पहली बार बदलाव हुई है. जबकि 5 साल में पहली बार आरबीआई ने ब्याज दरों में कटौती का ऐलान किया है. इससे पहले मई 2020 में ब्याज दरों में 40 बेसिस पॉइंट्स की कटौती हुई थी. बता दें कि पिछली पॉलिसी मीटिंग यानी दिसंबर, 2024 में 6 सदस्यों वाली एमपीसी ने लगातार 11वीं बार दरों में कोई बदलाव नहीं किया था, जोकि 6.50 फीसदी पर बरकरार रहा था.

आरबीआई की नीतिगत दरें

रेपो रेट 6.25%
SDF 6.00%
MSF 6.50%

गवर्नर संजय मल्होत्रा की पहली पॉलिसी मीटिंग

रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की यह पहली पॉलिसी मीटिंग है. MPC के प्रेसिडेंट संजय मल्होत्रा ने कहा कि औसत महंगाई दर टारगेट के मुताबिक है. भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहतर है. ग्लोबल इकोनॉमी की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. वहीं, अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती के बाद डॉलर में मजबूती देखने को मिल रही.

संजय मल्होत्रा ने दिसंबर, 2024 में गवर्नर का पदभार संभाला. संजय मल्होत्रा से पहले आरबीआई के गवर्नर शक्तिकात दास थे, जिन्होंने 2 साल से ब्याज दरों को स्थिर रखा.

RBI MPC Meet

क्यों घटता या बढ़ता है रेपो रेट?

देश का केंद्रीय बैंक आरबीआई हर दो महीने में पॉलिसी मीटिंग करता है. इसमें मुख्य रूप से रेपो रेट पर फोकस होता है, जिसमें इस बढ़ाने और घटाने पर नजरें होती हैं. बढ़ते जियो-पॉलिटिकल टेंशन के चलते दुनियाभर के सेंट्रल बैंक ने महंगाई पर काबू पाने के लिए दरों में इजाफा किया. इसमें भारत का केंद्रीय बैंक यानी RBI भी शामिल है. सेंट्रल बैंक के पास रेपो रेट के रूप में महंगाई से लड़ने का एक मजबूत हथियार है. ऐसे में जब भी महंगाई काबू से बाहर निकल जाती है या फिर निकलने लगती है तब RBI रेपो रेट में बदलाव करता है.

इससे अर्थव्यस्था में लिक्विडिटी फ्लो को कम करने की कोशिश की जाती है. यानी रेपो रेट हाई होगा तो बैंकों को RBI से मिलने वाला लोन महंगा मिलेगा. इसके चलते बैंक ग्राहकों को ज्यादा ब्याज दरों पर लोन बांटेंगे. नतीजनत, इकोनॉमी में लिक्विटी का फ्लो गिर जाएगा. और जब मनी फ्लो गिरेगा तो महंगाई घट जाएगी.

इसके ठीक उलट जब इकोनॉमी में लिक्विडिटी का फ्लो बढ़ाना होता है तब रिजर्व बैंक रेपो रेट को कम कर देती है. रेपो रेट कम होने से बैंकों को कम ब्याज पर RBI से लोन मिलता है. इससे ग्राहकों को भी लोन ब्याज दरों पर सस्ते में मिलता है. नतीजनत, इकोनॉमी की रफ्तार को जोश मिलता है. इसे उदाहरण से समझते हैं, कोरोना महामारी के समय आर्थिक संकट में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट घटाकर आर्थिक ग्रोथ में जोश भरने का काम किया.

रिवर्स रेपो रेट में बदलाव का असर

MPC पॉलिसी में रेपो रेट के साथ रिवर्स रेपो रेट का भी ऐलान किया जाता है. रिवर्स रेपो रेट उसे कहते है जिस रेट पर रिजर्व बैंक बैंकों को पैसा रखने पर ब्याज देता है. रिवर्स रेपो रेट में बढ़ोतरी कर RBI बाजार में नकदी को कम करता है. वहीं, बैंक RBI के पास अपनी होल्डिंग के लिए ब्याज लेकर इसका फायदा उठाते हैं. सेंट्रल बैंक इकोनॉमी में महंगाई बढ़ने के दौरान रिवर्स रेपो रेट बढ़ाता है, जिससे बैंकों के पास ग्राहकों को लोन देने के लिए फंड कम हो जाता है.

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