PHDCCI की ओर से LTCG टैक्स खत्म करने की मांग के बाद 29 अक्टूबर को एक बार फिर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) में राहत की चर्चाएं तेज हो गईं। ब्रोकरेज फर्म जेफरीज (Jefferies) का भी मानना है कि अगर शेयरों पर टैक्स घटता है, तो बाजार पर इसका सकारात्मक असर दिख सकता है। हालांकि, वित्त मंत्री के 13 अक्टूबर के बयान को ध्यान में रखना जरूरी है, जिसमें उन्होंने कहा था, "हम बजट के बेहद करीब हैं... ऐसे में मेरे लिए यह कहना सही नहीं होगा कि मैं किस प्रस्ताव पर विचार करूंगी और किस पर नहीं।" ऐसे माहौल में निवेशकों को FD, डेट फंड, इक्विटी और ELSS में टैक्स कटने के बाद मिलने वाले असल रिटर्न का पूरा गणित समझना बहुत जरूरी है।
मौजूदा नियमों के मुताबिक, इक्विटी और ELSS में ₹1.25 लाख से ज्यादा के मुनाफे पर 12.5% LTCG टैक्स लगता है। वहीं, 23 जुलाई 2024 के बाद एक साल से कम समय में बेचे गए शेयरों पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) टैक्स बढ़कर 20% कर दिया गया है। 1 अप्रैल 2023 के बाद खरीदे गए डेट फंड्स पर अब इंडक्सेशन का फायदा नहीं मिलता और इन पर निवेशक के टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। एफडी (FD) और आरडी (RD) से होने वाली ब्याज की कमाई पर भी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार ही टैक्स चुकाना होता है। बैंकों में ₹50,000 से ज्यादा ब्याज पर 10% TDS कटता है, जबकि वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह सीमा ₹1,00,000 है।

टैक्स के बाद FD, डेट म्यूचुअल फंड और इक्विटी/ELSS: कितना मिलेगा रिटर्न?
यहां बैंक एफडी और लिक्विड या ओवरनाइट जैसे शॉर्ट-टर्म फंड्स के ब्याज और टैक्स के बाद के रिटर्न की एक तुलना दी गई है। इससे आप अपने जोखिम, लिक्विडिटी और TDS या STT जैसे खर्चों के आधार पर बेहतर फैसला ले सकते हैं।
| निवेश विकल्प | अनुमानित 1-साल का रेट/रिटर्न | टैक्स/TDS या STT से जुड़ा नियम |
|---|---|---|
| बैंक एफडी (SBI/HDFC) | 6.8%–7.1% (सामान्य नागरिक) | ₹50,000 से ऊपर 10% TDS; सीनियर सिटीजन के लिए सीमा ₹1,00,000 |
| स्मॉल फाइनेंस बैंक एफडी | 7.1%–7.5% (सामान्य नागरिक) | TDS के नियम ऊपर जैसे ही हैं |
| लिक्विड फंड (औसत रिटर्न) | 6.46% (1 साल) | भारतीय निवासियों के लिए TDS नहीं; कमाई पर स्लैब के हिसाब से टैक्स |
| ओवरनाइट फंड (औसत रिटर्न) | 5.26% (1 साल) | भारतीय निवासियों के लिए TDS नहीं; कमाई पर स्लैब के हिसाब से टैक्स |
| उदाहरण: 1-साल का अनुमानित रिटर्न (सेस/सरचार्ज छोड़कर) | टैक्स से पहले | टैक्स के बाद (5% स्लैब) | टैक्स के बाद (30% स्लैब) |
|---|---|---|---|
| बैंक एफडी | 7.0% | 6.65% | 4.90% |
| लिक्विड फंड | 6.3% | 5.99% | 4.41% |
अवधि के हिसाब से कहां करें निवेश: 6-12 महीने, 1-3 साल और 5 साल से ज्यादा
6 से 12 महीने के लिए लिक्विड या ओवरनाइट फंड बेहतर विकल्प हैं, क्योंकि इनमें से पैसे निकालना आसान होता है और ऊंची टैक्स श्रेणी वाले लोग एफडी पर लगने वाले TDS से भी बच जाते हैं। 1 से 3 साल की अवधि के लिए अलग-अलग मैच्योरिटी वाली एफडी (FD laddering) के साथ शॉर्ट-ड्यूरेशन या कॉरपोरेट बॉन्ड फंड में मिलाकर निवेश कर सकते हैं। 5 साल या उससे ज्यादा समय के लिए ELSS और इंडेक्स फंड में पैसा लगाना सही रहता है। टैक्स-फ्री डेट रिटर्न के लिए PPF एक अच्छा विकल्प है। सोने में निवेश के लिए Sovereign Gold Bonds (SGB) बढ़िया हैं, हालांकि इनके रिडेम्पशन पर टैक्स छूट के नियम अब सीमित हो गए हैं। NPS में मैच्योरिटी पर 60% एकमुश्त रकम टैक्स-फ्री मिलती है, जबकि एनुइटी (Annuity) से होने वाली आय पर टैक्स लगता है। वहीं, ₹2.5 लाख से अधिक सालाना प्रीमियम वाले ULIP पर कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ता है।
LTCG नियमों में बदलाव हुआ या नहीं, तब क्या करें रणनीति?
अगर LTCG टैक्स के नियम नहीं बदलते हैं, तो अपनी SIP चालू रखें, हर साल ₹1.25 लाख तक का टैक्स-फ्री मुनाफा निकालें (गैन हार्वेस्टिंग) और गैर-जरूरी बिकवाली से बचें। वहीं अगर सरकार राहत का ऐलान करती है, तो शेयरों को बेचने से पहले नोटिफिकेशन की तारीख लागू होने का इंतजार करें और जब तक नियम पूरी तरह साफ न हों, एकमुश्त निवेश के बजाय SIP का ही रास्ता चुनें। स्थिति जो भी हो, अपने निवेश का फैसला सिर्फ खबरों के आधार पर न लें, बल्कि अपने वित्तीय लक्ष्यों और जरूरतों के मुताबिक एसेट एलोकेशन बनाएं। अभी चल रही बहस समीक्षा का संकेत जरूर देती है, लेकिन इसे नीतिगत बदलाव न मानें।


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