भारत के अगस्त महीने के खुदरा महंगाई (CPI) आंकड़े आज शाम 5:30 बजे जारी नहीं होंगे। 12 सितंबर को शनिवार होने के कारण सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) अब यह डेटा सोमवार, 14 सितंबर 2026 को शाम 5:30 बजे जारी करेगा। सोमवार को बाजार बंद होने तक ब्याज दरों की उम्मीदों, लोन ईएमआई और मार्केट प्राइसिंग के लिहाज से यह टाइमिंग काफी मायने रखती है। इसलिए आज जल्दबाजी में कोई कदम उठाने के बजाय डेटा जारी होने का इंतजार करना ही सही रणनीति होगी।
इस बार नजरें मुख्य रूप से सब्जियों, दालों, अनाज और एलपीजी-फ्यूल की कीमतों पर रहेंगी, खासकर जुलाई की गर्मी के असर के बाद। जुलाई में खुदरा महंगाई दर 4.45 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जिसमें ग्रामीण महंगाई 4.84 प्रतिशत और शहरी महंगाई 3.96 प्रतिशत रही थी। 2024 बेस ईयर वाले इन आंकड़ों में खाद्य महंगाई अब भी ऊंची बनी हुई थी। वहीं, आरबीआई मांग के दबाव को मापने के लिए जिस कोर इन्फ्लेशन पर नजर रखता है, वह हाल ही में 3.9 प्रतिशत के आसपास रही है।

CPI डेटा की टाइमिंग और RBI पॉलिसी पर नजर
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 5 अगस्त को नीतिगत रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था और अपना रुख 'न्यूट्रल' बनाए रखा। हालांकि, एमपीसी की बैठक के मिनट्स में आगाह किया गया था कि अगर खाद्य और ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर कोर इन्फ्लेशन पर पड़ा, तो नीति सख्त की जा सकती है। मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की अगली बैठक 5–7 अक्टूबर 2026 को होगी। इस बीच, 10 साल वाला बेंचमार्क यील्ड 6.96 प्रतिशत के करीब बना हुआ है और रुपया (USDINR) 95.6 के आसपास कारोबार कर रहा है।
सब्जियां, दालें, अनाज और LPG: सीपीआई के इन घटकों पर रखें नजर
फूड बास्केट में हो रहे बदलावों पर बारीक नजर रखना जरूरी है। सब्जियों के दाम महीने-दर-महीने तेजी से बदल सकते हैं, जबकि दालें और अनाज सप्लाई में सख्ती का संकेत देते हैं। ईंधन से जुड़े आंकड़े इसलिए अहम हैं क्योंकि सीपीआई में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की दरें हर महीने की 15 तारीख को दर्ज की जाती हैं। भले ही कोर महंगाई स्थिर रहे, लेकिन इन घटकों में आया कोई भी अप्रत्याशित बदलाव कुल महंगाई (Headline Inflation) में उतार-चढ़ाव बढ़ा सकता है।
CPI के अलग-अलग परिदृश्य: EMI, बचतकर्ताओं और निवेशकों पर असर
अगर अगस्त की महंगाई दर जुलाई के 4.45 प्रतिशत से ज्यादा रहती है, तो बाजार मानकर चलेगा कि दर कटौती में लंबा ब्रेक लगेगा या दरें बढ़ने का जोखिम है। रेपो रेट से जुड़े लोन हर तीन महीने में कम से कम एक बार रीसेट होते हैं, इसलिए ईएमआई पर सबसे तेज असर दिखेगा। MCLR आधारित लोन तय रीसेट शेड्यूल (अक्सर सालाना या छमाही) के मुताबिक बदलेंगे। बैंक जमा दरें स्थिर रहने की उम्मीद है, जबकि लॉन्ग-टर्म डेट फंड्स के NAV पर दबाव दिख सकता है। अगर आंकड़े अनुमान से कम आते हैं तो स्थिति इसके उलट होगी; ऐसे में अपनी एसआईपी (SIP) जारी रखें। हालांकि, अगर खाद्य महंगाई ऊंची बनी रहती है, तो गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करें और बड़ी खरीदारी को नई फसल की आवक तक टालें।


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