सितंबर के महीने में जीएसटी कलेक्शन का आंकड़ा ₹2.04 लाख करोड़ के करीब पहुंच गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 14.7 फीसदी ज्यादा है। यह लगातार तीसरा ऐसा महीना है जब कलेक्शन ₹2 लाख करोड़ के पार रहा है। वहीं, नेट जीएसटी कलेक्शन करीब 18.1 फीसदी बढ़कर ₹1.77 लाख करोड़ हो गया। वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद जीएसटी का यह मजबूत आंकड़ा बेहतर टैक्स नियमों के पालन और देश में बनी मजबूत मांग को दर्शाता है।
घरेलू जीएसटी कलेक्शन 10.1 फीसदी की बढ़त के साथ ₹1.38 लाख करोड़ रहा। वहीं, इंपोर्ट (आयात) से मिलने वाला जीएसटी 25.9 फीसदी की भारी बढ़ोतरी के साथ ₹65,525 करोड़ पर पहुंच गया, जिसने कुल आंकड़े को बड़ा सहारा दिया। जीएसटी का यह ट्रेंड दिखाता है कि कंजप्शन, लॉजिस्टिक्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सप्लायर्स को अच्छा फायदा मिल रहा है। हालांकि, त्योहारी सीजन की शुरुआत के बावजूद एक्सपोर्ट पर निर्भर कंपनियों की रफ्तार तब तक सुस्त रह सकती है जब तक वैश्विक मांग स्थिर नहीं हो जाती। ऐसे में निवेशकों को केवल हेडलाइन आंकड़े देखने के बजाय बाजार के बदलते दायरे पर ध्यान देना चाहिए।

अब कहां लगाएं पैसा— एफडी, डेट फंड या स्टॉक्स?
अगर आपको कम समय के लिए पैसे पार्क करने हैं, तो सामान्य सेविंग्स अकाउंट के बजाय लिक्विड या ओवरनाइट फंड्स बेहतर विकल्प हैं। इस कैटेगरी में एक साल का रिटर्न करीब 6.5 से 7.0 फीसदी के बीच रहा है। वहीं, अल्ट्रा-शॉर्ट फंड्स में पोर्टफोलियो यील्ड 7.1 से 7.3 फीसदी के आसपास दिख रही है। आर्बिट्राज फंड्स ने एक साल में 6.3 से 7.0 फीसदी का रिटर्न दिया है, जिस पर इक्विटी के हिसाब से टैक्स लगता है। कुछ चुनिंदा बैंकों की 1 साल की एफडी 6.5 से 7.75 फीसदी तक ब्याज ऑफर कर रही हैं। हालांकि, सिर्फ विज्ञापनों में दिख रही ब्याज दरों पर न जाएं, बल्कि लिक्विडिटी, टैक्स के बाद मिलने वाले असल रिटर्न और एग्जिट कॉस्ट को ध्यान में रखकर ही फैसला लें।
| विकल्प | अनुमानित सालाना यील्ड | लिक्विडिटी | टैक्स नियम | सही अवधि |
|---|---|---|---|---|
| शॉर्ट-टर्म एफडी (6–12 महीने) | 6.5–7.75% | पेनॉल्टी के साथ समय से पहले निकासी संभव | टैक्स स्लैब के हिसाब से | 3–12 महीने |
| लिक्विड/ओवरनाइट फंड्स | 6.2–7.0% | T+0/T+1 | टैक्स स्लैब के हिसाब से | 1–6 महीने |
| अल्ट्रा-शॉर्ट फंड्स | ~7.1–7.3% YTM | T+1 | टैक्स स्लैब के हिसाब से | 3–9 महीने |
| आर्बिट्राज फंड्स | 6.3–7.0% | T+2 | इक्विटी टैक्स नियम लागू | 3–12 महीने |
| टार्गेट-मैच्योरिटी फंड्स (2026–2031) | ~7.2–7.5% YTM | डेली एनएवी; कीमतों में उतार-चढ़ाव | टैक्स स्लैब के हिसाब से | मैच्योरिटी तक बने रहें |
डेट फंड बनाम टार्गेट-मैच्योरिटी: 6 से 24 महीने और उससे आगे की रणनीति
6 से 24 महीने की अवधि के लिए ब्याज दर के जोखिम से बचने हेतु अल्ट्रा-शॉर्ट या लो-ड्यूरेशन फंड्स को प्राथमिकता दें। 5-7 अक्टूबर को होने वाली रिजर्व बैंक (RBI) की बैठक को देखते हुए लंबी अवधि वाले दांव थोड़े जोखिम भरे हो सकते हैं। लंबे समय के लक्ष्यों के लिए टार्गेट-मैच्योरिटी फंड्स या भारत बॉन्ड जैसे ईटीएफ चुन सकते हैं। इस समय इन फंड्स में मार्क-टू-मार्केट उतार-चढ़ाव के साथ करीब 7.2 से 7.5 फीसदी की पोर्टफोलियो यील्ड उपलब्ध है। इन्हें मैच्योरिटी तक होल्ड करने से आपका कैशफ्लो सही रहता है और री-इन्वेस्टमेंट का रिस्क भी कम हो जाता है।
सितंबर जीएसटी आंकड़ों के बाद शेयर बाजार (इक्विटी) पर क्या रखें नजरिया?
शेयर बाजार में एसआईपी (SIP) के जरिए निवेश जारी रखें और अपने पैसे को लार्ज व मिड कैप शेयरों में बांटकर लगाएं। बैंकिंग, ऑटो, सीमेंट, रेलवे और रोड कंस्ट्रक्शन से जुड़े सप्लायर्स पर खास ध्यान दिया जा सकता है। वहीं, पोर्टफोलियो में संतुलन बनाए रखने के लिए हेल्थकेयर और कंज्यूमर स्टेपल्स जैसे डिफेंसिव सेक्टर्स को भी शामिल रखें। बाजार का रुख समझने के लिए अगले हफ्ते कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की चाल और नीतिगत संकेतों पर नजर बनाए रखें। कम जोखिम लेने वाले निवेशक डेट और आर्बिट्राज फंड्स का दायरा बढ़ा सकते हैं, जबकि एग्रेसिव इन्वेस्टर्स इक्विटी में अपना एक्सपोजर बढ़ा सकते हैं।


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