जोखिम बढ़ने के कारण आज सुबह भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड का यील्ड (yield) 7% के पार चला गया। 6.94% 2036 बेंचमार्क इंट्राडे के दौरान 7.02% के करीब कारोबार कर रहा था। वहीं, ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर से ऊपर बना हुआ है, जिससे इंपोर्टेड महंगाई का खतरा बढ़ गया है। शुरुआती कारोबार में रुपया भी कमजोर हुआ, जिससे घरेलू वित्तीय हालात पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में ब्याज दरों में आई इस तेजी को देखते हुए निवेशक अब फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और डेट फंड्स में अपने निवेश की रणनीति पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं।
एफडी की ब्याज दरों में अब बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। बड़े बैंक आम जमाकर्ताओं को लगभग 6.25% से 6.90% तक ब्याज दे रहे हैं, जबकि कुछ स्मॉल फाइनेंस बैंक चुनिंदा अवधि के लिए 8.0% से 8.3% तक के ब्याज का दावा कर रहे हैं। ध्यान रखें कि डिपॉजिट इंश्योरेंस के तहत प्रति बैंक, प्रति जमाकर्ता ₹5 लाख तक का कवर ही मिलता है। इसलिए अलग-अलग बैंकों और समयावधि में समझदारी से निवेश बांटें। आज जी-सेक (G-sec) के मुकाबले मिल रहा यह अंतर ही निवेशकों के फैसले तय कर रहा है।

FD बनाम शॉर्ट-ड्यूरेशन बनाम गिल्ट फंड: जानें ब्याज, जोखिम और टैक्स का गणित
जब यील्ड में उछाल आता है, तो लॉन्ग-ड्यूरेशन और गिल्ट फंड्स में ज्यादा गिरावट दिखती है, जबकि शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड्स नुकसान को सीमित रखते हैं। 1 अप्रैल, 2023 के बाद से डेट म्यूचुअल फंड्स से होने वाले मुनाफे पर इंडेक्सेशन का फायदा खत्म कर दिया गया है और अब इस पर आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। हालांकि, टैक्स केवल रिडेम्पशन के समय ही देना होता है, जिससे कंपाउंडिंग का फायदा मिलता है। इसलिए अपने फंड की अवधि को अपने वित्तीय लक्ष्य के हिसाब से ही चुनें और बाजार के हिसाब से बड़ा बदलाव करने से बचें।
| विकल्प | आज की दर/यील्ड | रिटर्न पर टैक्स | लिक्विडिटी/सुरक्षा |
|---|---|---|---|
| 10-वर्षीय जी-सेक | ~7.02% इंट्राडे | म्यूचुअल फंड रिटर्न पर स्लैब के अनुसार टैक्स | सोवरेन सुरक्षा; NAV में उतार-चढ़ाव संभव |
| बड़े बैंकों की एफडी | ~6.25%–6.90% | ब्याज पर स्लैब के अनुसार टैक्स | समय से पहले निकालने पर जुर्माना; ₹5 लाख तक बीमित |
| स्मॉल फाइनेंस बैंक एफडी | ~7.8%–8.3% | ब्याज पर स्लैब के अनुसार टैक्स | समय से पहले निकालने पर जुर्माना; ₹5 लाख तक बीमित |
स्रोत: लाइव 10Y आंकड़े, बैंक एफडी ट्रैकर्स और DICGC नियम।
FD बनाम शॉर्ट-ड्यूरेशन बनाम गिल्ट फंड: ब्रेकइवन के आसान उदाहरण
इसे 3 साल की अवधि के उदाहरण से समझें। मान लीजिए एफडी पर 7.0% ब्याज मिल रहा है और शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड भी प्री-टैक्स 7.0% नेट रिटर्न दे रहा है। म्यूचुअल फंड पर टैक्स रिडेम्पशन के समय स्लैब रेट के मुताबिक लगेगा:
| टैक्स स्लैब | एफडी का प्रभावी सालाना रिटर्न | शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड का प्रभावी सालाना रिटर्न |
|---|---|---|
| 5% | 6.65% | ~6.65% |
| 20% | 5.60% | ~5.70% |
| 30% | 4.90% | ~5.00% |
टैक्स टालने (डेफरल) और कंपाउंडिंग के कारण ज्यादा टैक्स स्लैब वाले निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड थोड़े बेहतर साबित होते हैं। हालांकि, अंतिम रिटर्न TER और कैशफ्लो पर निर्भर करता है।
लेडर्ड एफडी बनाम टारगेट-मैच्योरिटी फंड: सही अवधि कैसे चुनें?
एफडी लेडरिंग (अलग-अलग मैच्योरिटी में बांटकर निवेश) से री-इन्वेस्टमेंट का जोखिम कम होता है और पैसों की जरूरत भी आसानी से पूरी होती है। दूसरी ओर, टारगेट-मैच्योरिटी फंड्स एक निश्चित इंडेक्स को ट्रैक करते हैं। अगर इन्हें मैच्योरिटी तक रखा जाए, तो ये शुरुआत में तय YTM के आसपास रिटर्न दे सकते हैं, हालांकि बीच-बीच में इनके NAV में उतार-चढ़ाव आ सकता है। केवल ज्यादा रिटर्न के चक्कर में लंबी अवधि चुनने के बजाय वही मैच्योरिटी चुनें जो आपके गोल से मेल खाती हो। इसके अलावा फंड के खर्च और क्रेडिट क्वालिटी पर भी ध्यान दें।
मौजूदा दौर में किन्हें लिक्विड या ओवरनाइट फंड्स में बने रहना चाहिए?
अगर आपको अगले छह महीने के भीतर पैसों की जरूरत है, तो उन्हें लिक्विड या ओवरनाइट फंड्स में रखना ही सही है। लिक्विड फंड्स में प्रतिदिन ₹50,000 या 90% तक इंस्टेंट रिडेम्पशन की सुविधा मिलती है, हालांकि शुरुआती 7 दिनों में इसमें क्रमबद्ध (स्लैब-वाइज) एग्जिट लोड लगता है। ओवरनाइट फंड्स में यह एग्जिट लोड नहीं लगता, लेकिन इनका सेटलमेंट T+1 दिन में होता है। क्रूड ऑयल और रुपये में जारी उतार-चढ़ाव के इस दौर में अपने इमरजेंसी फंड को इन्हीं सुरक्षित विकल्पों में रखें।


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