नयी दिल्ली। पिछले कुछ महीनों में बैंक की एफडी पर ब्याज दरों में गिरावट आई है। ऐसे में बड़ी संख्या में निवेशकों का रुझान अब बॉन्ड की तरफ बढ़ा है। पहले के मुकाबले ज्यादा लोग बॉन्ड में निवेश करने पर ध्यान दे रहे हैं। अगर आप भी बॉन्ड में पैसा लगाने जा रहे हैं तो निवेश से पहले कुछ विशेष बातों का जानना जरूरी है। दरअसल बॉन्ड्स में भी अलग-अलग कैटेगरी होती हैं। इनके फीचर्स भी विभिन्न होते हैं, जिनमें कूपन दर, लॉक-इन अवधि, कार्यकाल और उन पर लागू टैक्स नियम अलग-अलग होते हैं। कुछ बॉन्ड्स लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स देने से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें निवेश करने से पहले आपको टैक्स नियमों की जानकारी हासिल करना जरूरी है। भारत में बॉन्ड्स पर टैक्स कैसे लगाया जाता है, इसके बारे में जानने की जरूरत है।
लिस्टेड बॉन्ड
स्टॉक एक्सचेंजों पर लिस्टेड बॉन्ड के लिए निवेश की अवधि को उस स्थिति में लंबा माना जाएगा अगर आप उन्हें एक वर्ष से अधिक समय तक रखते हैं। एक वर्ष से पहले लाभ / हानि को अल्पकालिक (Short Term) माना जाएगा। इन बॉन्ड्स से होने वाला अल्पकालिक पूंजीगत लाभ आपकी ग्रॉस कुल इनकम में जुड़ जाता है और टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगाया जाता है। इन बॉन्ड्स से अर्जित ब्याज पर भी स्लैब दरों के अनुसार टैक्स लगाया जाता है। लेकिन दीर्घकालिक (लंबी अवधि) पूंजीगत लाभ पर सरचार्ज सहित 10.4% टैक्स लगाया जाता है।
टैक्स-फ्री बॉन्ड (लिस्टेड)
टैक्स-फ्री बॉन्ड बाजार में सबसे अधिक मांग वाले निवेशों में से एक हैं। ये बॉन्ड सरकारी कंपनियों द्वारा जारी किए जाते हैं। इन बॉन्डों से अर्जित ब्याज पर इनकम टैक्स से छूट मिलती है। यदि आप इन बॉन्ड्स में एक वर्ष से अधिक समय तक निवेश रखते हैं, तो निवेश की अवधि को दीर्घकालिक माना जाता है और दीर्घकालिक निवेश से होने वाले लाभ पर सरचार्ड सहित 10.4% का टैक्स लगाया जाता है। यदि आप एक वर्ष से पहले इन बॉन्ड्स को बेचते हैं तो लाभ को अल्पावधि माना जाएगा और आपके स्लैब दरों के अनुसार टैक्स लगाया जाएगा।
टैक्स-फ्री बॉन्ड (अन-लिस्टेड)
अन-लिस्टेड (लिस्ट न हुए) टैक्स-फ्री बॉन्ड के मामले में निवेश की अवधि को लंबी अवधि तब माना जाएगा जब आप उन्हें तीन साल से अधिक समय तक रखते हैं। इन बॉन्ड से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर सरचार्ज सहित 20.8 फीसदी टैक्स लगता है। अल्पकालिक पूंजीगत लाभ पर स्लैब दरों पर कर लगाया जाता है।


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