नई दिल्ली, सितंबर 9। बीमा पॉलिसी लेने के बाद एक प्रमाण पत्र या दस्तावेज मिलता है। इसमें बीमा के बारे में सभी जानकारी होती है। इसमें कितने साल का बीमा है, किस्ता कितनी है, इस बात की पूरी जनकारी होती है। बीमा नियामक चाहता था कि इस दस्तावेज में यह भी लिखा जाए कि इस पॉलिसी को लेने के लिए एजेंट को कमीशन कितना दिया गया है। लेकिन अब शायद ऐसा नहीं हो पाएगा। आइये जानते हैं इसके नुकसान और फायदे।
जानिए बीमा में कमीशन का खेल
देश में लगभग सभी बीमा एजेंट्स के माध्यम से ही खरीदा जाता है। बीमा कंपनियां अपने एजेंट को बीमा बेचने के लिए भारी भरकम कमीशन देती हैं। इसके अलावा टारगेट दिए जाते हैं। अगर बीमा एजेंट यह टारगेट पूरे कर लेता है, तो अतिरिक्त फायदे दिए जाते हैं। यानी बीमा लेने वाले के पैसों से यह पूरा खेल होता है। बीमा नियामक चाहता था कि इस व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए। इसके चलते बीमा लेने के बाद मिलने वाले दस्तावेज पर इस बात का उल्लेख किया जाए कि इस बीमा को बेचने पर कमीशन कितना दिया गया है। लेकिन इस बात का भारी विरोध किया गया। आइये जानते हैं इस प्रस्ताव का विरोध किसने किया।
एलआईसी को पसंद नहीं आया यह प्रस्ताव
मीडिया में आई खबरों के अनुसार एलआईसी और उसके एजेंट इस व्यवस्था के विरोध में थे। इन लोगों का कहना था कि इससे एजेंट का काम प्रभावित होगा। यही कारण है कि अब शायद बीमा नियामक इस व्यवस्था को लागू नहीं करेगा। ऐसा होता है, तो बीमाधारक को कभी भी यह पता नहीं चल पाएगा कि उसके प्रीमियम से कितना पैसा कमीशनबाजी में गया है।
जानिए कैसे कटता है कमीशन
बीमा लेने पर बीमाधारक को भारी भरकम कमीशन कटता है। यह कमीशन पहली किस्त से शुरू होकर अंतिम किस्त तक कटता रहता है। ऐसे में अगर यह जानकारी बीमाधारक को दी जाती है, वह सही बीमा खरीदने में सक्षम होता। लेकिन एलआईसी और बीमा एजेंट्स के विरोध के चलते यह नहीं हो पा रहा है।


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