केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने असेसमेंट ईयर (AY) 2026-27 के लिए ऑडिट वाले मामलों में डेडलाइन बढ़ा दी है। अब टैक्स ऑडिट रिपोर्ट जमा करने की आखिरी तारीख 21 अक्टूबर 2026 कर दी गई है। वहीं, जिन करदाताओं का ऑडिट होना है, वे अब 21 नवंबर 2026 तक अपना इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल कर सकते हैं। इस राहत के दायरे में कंपनियां, फर्म, LLP, ऑडिट के तहत आने वाले प्रोपराइटर और ऐसी फर्मों के पार्टनर शामिल हैं। हालांकि, नॉन-ऑडिट करदाताओं के लिए डेडलाइन में कोई बदलाव नहीं हुआ है। वित्त मंत्रालय ने 28 सितंबर 2026 को इस संबंध में नोटिफिकेशन जारी किया था।
मिले अतिरिक्त समय का इस्तेमाल आखिरी वक्त की भागदौड़ और गलतियों से बचने के लिए करें। अकाउंट बुक्स क्लोज करें, एडजस्टमेंट तय करें और सही सेल्फ-असेसमेंट टैक्स की गणना करें। फॉर्म 3CA या 3CB को 3CD के साथ अपलोड करने से पहले वैलिड UDIN जरूर जनरेट कर लें। इसके अलावा, अपने AIS, TIS और फॉर्म 26AS का मिलान (Reconciliation) कर लें। बैंक अकाउंट को प्री-वैलिडेट करें और DSC यूटिलिटीज को अपडेट रखने के साथ ही OTP या emsigner से जुड़ी दिक्कतों को पहले ही सुलझा लें।

CBDT ने बढ़ाई ITR की डेडलाइन: जानिए किसे मिला फायदा और क्या हैं नई तारीखें
आइए समझते हैं कि इस फैसले से किसे राहत मिली है और किसके नियम पहले जैसे ही हैं। यह छूट धारा 139(1) के स्पष्टीकरण (Explanation) 2 के क्रम संख्या 2 में आने वाले करदाताओं पर लागू होती है। इसमें मुख्य रूप से वे सभी टैक्सपेयर्स और उनके पार्टनर शामिल हैं, जिनके लिए इनकम टैक्स एक्ट या किसी अन्य कानून के तहत ऑडिट कराना अनिवार्य है। ध्यान रहे कि ट्रांसफर प्राइजिंग से जुड़े मामलों में रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख पहले की तरह 30 नवंबर ही रहेगी।
| करदाता की श्रेणी | ऑडिट रिपोर्ट की तारीख | ITR फाइल करने की आखिरी तारीख |
|---|---|---|
| ऑडिट केस: कंपनियां, फर्म, LLP, ऑडिटेड प्रोपराइटर और ऑडिटेड फर्मों के पार्टनर | 21 Oct 2026 | 21 Nov 2026 |
| धारा 92E के तहत आने वाले ट्रांसफर प्राइजिंग केस | 31 Oct 2026 | 30 Nov 2026 |
| नॉन-ऑडिट इंडिविजुअल (ITR-1/2); नॉन-ऑडिट बिजनेस/प्रोफेशन (ITR-3/4) | NA | 31 Jul 2026; 31 Aug 2026 |
पोर्टल पर फाइलिंग का स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस और UDIN
पोर्टल पर सही प्रक्रिया अपनाकर आप दोबारा काम करने की परेशानी से बच सकते हैं। सबसे पहले ऑडिटर लॉगिन करके फॉर्म 3CD के साथ 3CA या 3CB तैयार करते हैं, UDIN जनरेट करते हैं और उसे अपलोड करते हैं। इसके बाद टैक्सपेयर इस रिपोर्ट को रिव्यू करके एक्सेप्ट करता है। फिर टैक्सपेयर अपना ITR फाइल करता है और 'e-Pay Tax' के जरिए बकाया टैक्स जमा करता है। आखिर में DSC या आधार OTP के जरिए e-Verify करें। ध्यान रखें कि emsigner अपडेटेड हो और DSC सही तरीके से रजिस्टर की गई हो।
देर से फाइल करने का जोखिम, ब्याज का गणित और कैलकुलेशन
डेडलाइन चूकने पर आपको ब्याज के साथ-साथ लेट फीस भी भरनी पड़ सकती है। धारा 234A के तहत, तय तारीख के बाद फाइल करने पर बकाया टैक्स राशि पर 1% प्रति माह की दर से ब्याज लगता है। वहीं, एडवांस टैक्स में कमी होने पर धारा 234B और 234C के तहत ब्याज लागू होता है। उदाहरण के लिए, अगर आपका ₹20,000 का टैक्स बकाया है और आप 25 नवंबर 2026 को रिटर्न भरते हैं, तो धारा 234A के तहत ₹200 का अतिरिक्त ब्याज जुड़ जाएगा। इसके अलावा एडवांस टैक्स का ब्याज अलग से लग सकता है।
ओल्ड बनाम न्यू टैक्स रिजीम: एक नज़र में समझें अंतर
| सुविधा/नियम | ओल्ड रिजीम (पुरानी कर व्यवस्था) | न्यू रिजीम (धारा 115BAC) |
|---|---|---|
| डिफ़ॉल्ट स्टेटस | ज़रूरत के मुताबिक चुनना पड़ता है | व्यक्तिगत और अन्य करदाताओं के लिए डिफ़ॉल्ट |
| स्टैंडर्ड डिडक्शन | मिलेगा | मिलेगा |
| 80C, 80D और चैप्टर VI-A की ज्यादातर छूट | अनुमति है | अनुमति नहीं है (कुछ खास मदों को छोड़कर) |
| HRA और LTA | अनुमति है | अनुमति नहीं है |
| धारा 80CCD(2) के तहत एम्प्लॉयर NPS | अनुमति है | अनुमति है |
टैक्स रिजीम का चुनाव आपकी इन-हैंड सैलरी पर सीधा असर डालता है। पुरानी व्यवस्था में आपको 80C, 80D, HRA और LTA जैसी कटौतियों का फायदा मिलता रहता है। वहीं धारा 115BAC के तहत नई कर व्यवस्था में टैक्स स्लैब तो आसान हैं, लेकिन छूट कम मिलती हैं। हालांकि, इसमें भी धारा 80CCD(2) के तहत एम्प्लॉयर NPS योगदान पर डिडक्शन और स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ मिलता है। इसीलिए, अपने सैलरी प्रूफ लॉक करने से पहले सरचार्ज और सेस को ध्यान में रखते हुए दोनों व्यवस्थाओं का सही हिसाब लगा लें।


Click it and Unblock the Notifications
