आजकल एक टॉपिक लोगों के बीच ट्रेंड कर रहा है जो कि बैंको में रखे आपके पैसों से जुड़ा हुआ है। इस टॉपिक में तमाम लोग सीधे तौर पर लिख रहे हैं कि बैंको में रखा आपका पैसा किसी भी वक्त सरकार निकाल सकती है या फिर आपको निकालने से रोक सकती है।
हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे, उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर अपनी राय देते हुए कहा था कि, ये बहुत सशक्त प्लेटफॉर्म है और इसका इस्तेमाल बहुत ही समझदारी से और जिम्मेदारी से करना चाहिए। ये तो ओबामा का बयान था जो आया और चला गया, पर अब जब आप सोशल मीडिया देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि हम कितने जिम्मेदार हैं और कितने समझदार हैं।
यहां एफआरडीआई (FRDI) यानि फाइनेंशियल रेजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस की बात हो रही है। जिसे लेकर सोशल मीडिया पर तमाम भ्रांतियां फैलायी जा रही हैं। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि एफआरडीआई (FRDI) यानि फाइनेंशियल रेजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल क्या है और बैंको में रखे आपके पैसों पर सरकार और वित्तीय मामलों के जानकारों की क्या राय है।
क्या है FRDI बिल ?
एफआरडीआई (FRDI) यानि फाइनेंशियल रेजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल, डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन के तहत आता है जिसमें ये प्रवाधान है कि अगर बैंक दीवालिया हो जाए तो वह बैंक में आपकी जमा राशि का अधिकतम 1 लाख रुपए तक देने के लिए बाध्य है।
ऐसे समझें
मान लीजिए की आप ने एक बैंक 'ए' में 80,000 रुपये का जमा किए हैं, जिसमें 9,000 रुपये की ब्याज राशि भी शामिल है। यदि बैंक 'ए' पूरी राशि नहीं दे पाता तो डीआईसीजीसी आप को 89,000 हजार रुपए भुगतान करेगी। हालांकि, अगर फिक्स्ड डिपॉजिट 2 लाख रुपए हैं, तो आप को सिर्फ 1 लाख रुपये ही मिलेंगे।
जरूरी जानकारी
ये सवाल अक्सर पैदा हो सकता है- हमें कैसे पता होगा अगर डीआईसीजीसी ने मेरे बैंक का बीमा किया है? आप को बता दें कि देश में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सभी बीमा कराते हैं हालांकि, यह बहुत छोटे स्थानीय सहकारी बैंकों के मामले में कहना मुश्किल है।
कितना पैसा मिलेगा?
अगर आप के बैंक की दो ब्रांच में जमा का कुल राशि 1.5 लाख है, तो आप को एक लाख रुपए ही मिलेगें। आपके दावों के उद्देश्य के लिए बीमा और मूल राशि को एक साथ जोड़ा जाता है।
अलग अलग बैंकों में पैसा जमा हो तो क्या होता है?
अगर दो अलग बैंको में आपका पैसा जमा है और दोनों बैंक दीवालिया हो जाते हैं तो इस परिस्थित में आपको मिलने वाली राशि दो लाख हो जाती है। यहां यह याद रखना जरूरी है कि इस प्रकार की बीमा राशि प्रति व्यक्ति नहीं बल्कि प्रति बैंक दीवालिया बैंक के अनुसार तैयार की जाती है।
क्या कहते हैं बैंकिंग एक्सपर्ट्स
वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेंद्र कुमार इस विषय पर कहते हैं कि, अभी जो स्थित है उसमें यदि बैंक डूब जाएं और उसमें सरकार का हस्तक्षेप ना हो तो लोगों को उनके पैसे का किसी खास तरीके का प्रोटेक्शन नहीं मिलता है। उन्होंने कहा कि बिल में लोगों के पैसों को सुरक्षा देने के लिए तमाम अंतरिम प्रावधान हैं। हालांकि उन्होंने ये भी उम्मीद जताई कि बैंको के दीवालिया होने जैसी स्थिति आएगी ही नहीं। धीरेंद्र कुमार ने कहा कि, उन्हे ये लगता है कि ये नियम काफी सोच-विचार करके बनाया गया है, ये एक बेहतरी के लिए बदलाव है और ये कानून काफी कारगर साबित होगा।
बीमा राशि बढ़ाने की मांग
वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेंद्र कुमार ने कहा कि, आज अगर बैंक दीवालिया हो जाए तो लोगों को सिर्फ 1 लाख रुपए तक ही मिलेंगे जो कि आज के हिसाब से कुछ भी नहीं है। कोई व्यक्ति अपने जीवन भर की पूंजी बैंक में जमा करके रखता है और एक झटके में ही उसकी पूंजी बैंक के दीवालिया होने पर खत्म हो जाए तो ये ठीक नहीं है। धीरेंद्र कुमार ने कहा कि सरकार को डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी की रकम 1 से ज्यादा बढ़ानी चाहिए।
क्या है वित्तीय विश्लेषकों की राय
वहीं बैंकिंग से जुड़े तमाम विश्लेषकों का भी कहना है कि अगर बिल में ऐसा कोई बिंदु है जिसमें लोगों के पैसों को सीज करने या फिर उसे सरकार द्वारा ले लेने जैसी बात है तो ये बैंकिंग के भरोसे पर बहुत बड़ा सवाल होगा। हालांकि एक्सपर्ट्स सीधे तौर पर कह रहे हैं कि भारत में बैंको के दीवालिया होने जैसी कोई समस्या है।
वित्तमंत्री का ट्वीट
हालांकि इसके बाद भी लोगों के मन में तमाम शंकाएं हैं। इसी भ्रम को दूर करने के लिए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ट्वीट भी किया। हालांकि उनके ट्वीट में भी लोगों ने सवाल उठाए हैं। अब इस मामले पर वित्तमंत्रालय की तरफ से एक प्रेस नोट जारी किया गया है। हम वह प्रेस नोट यहां आपके सामने अक्षरश: प्रस्तुत कर रहे हैं।
वित्तमंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति
ता. 7 दिसबंर 2017 (PIB)
लोकसभा में 11 अगस्त, 2017 को पेश किया गया वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा विधेयक, 2017 (एफआरडीआई विधेयक) फिलहाल संसद की संयुक्त समिति के विचाराधीन है। संयुक्त समिति एफआरडीआई विधेयक के प्रावधानों पर सभी हितधारकों के साथ सलाह-मशविरा कर रही है। एफआरडीआई विधेयक के ‘संकट से उबारने' वाले प्रावधानों के संबंध में मीडिया में कुछ विशेष आशंकाएं व्यक्त की गई हैं। एफआरडीआई विधेयक, जैसा कि संसद में पेश किया गया है, में निहित प्रावधानों से जमाकर्ताओं को वर्तमान में मिल रहे संरक्षण में कोई कमी नहीं की गई है, बल्कि इनसे जमाकर्ताओं को कहीं ज्यादा पारदर्शी ढंग से अतिरिक्त संरक्षण प्राप्त हो रहे हैं।एफआरडीआई विधेयक कई अन्य न्याय-अधिकारों अथवा क्षेत्राधिकारों के मुकाबले कहीं ज्यादा जमाकर्ता अनुकूल है, जिसमें संकट से उबारने के वैधानिक प्रावधान किये गये हैं, जिसके लिए लेनदारों/जमाकर्ताओं की सहमति की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
एफआरडीआई विधेयक में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों समेत समस्त बैंकों को वित्तीय एवं समाधान सहायता देने संबंधी सरकार के अधिकारों को किसी भी रूप में सीमित करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। इस विधेयक के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सरकार की अंतर्निहित गारंटी किसी भी तरह से प्रभावित नहीं हुई है।
भारतीय बैंकों के पास पर्याप्त पूंजी है और ये विवेकपूर्ण नियमों एवं पर्यवेक्षण के दायरे में भी आते हैं, ताकि उनकी पूरी सुरक्षा, मजबूत वित्तीय स्थिति एवं प्रणालीगत स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। वर्तमान कानून बैंकिंग प्रणाली की अखण्डता, सुरक्षा एवं संरक्षा सुनिश्चित करते हैं। भारत में बैंकों को विफल होने से बचाने और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाए जाते हैं और नीतिगत उपाय किये जाते हैं, जिनमें आवश्यक निर्देश जारी करना/त्वरित सुधारात्मक कदम उठाना, पूंजीगत पर्याप्तता एवं विवेकपूर्ण मानक लागू करना शामिल हैं। एफआरडीआई विधेयक एक व्यापक समाधान व्यवस्था सुनिश्चित करके बैंकिंग प्रणाली को और मजबूत करेगा। किसी वित्तीय सेवा प्रदाता के विफल होने की दुर्लभ स्थिति में व्यापक समाधान व्यवस्था के तहत जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए एक त्वरित, क्रमबद्ध एवं सक्षम समाधान प्रणाली पर अमल किया जाएगा।


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