नई दिल्ली, फरवरी 10। मैसूर के पन्नूर गांव के एक धान किसान कृष्णप्पा दासप्पा गौड़ा को पंद्रह साल पहले शून्य बजट प्राकृतिक खेती (जेडबीएनएफ) के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अपने पूर्वजों के व्यवसाय को जारी रखते हुए, उन्होंने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग करते हुए मौसम के बाद धान की रोपाई की। 25 एकड़ के उनके खेतों में फसल के लिए काफी निवेश करना पड़ा और उपज भी कम रही, लेकिन इससे उन्हें अच्छी आजीविका मिलती रही। 2005 में एक व्यक्ति से मिल कर कृष्णप्पा का जीवन बदल गया और वे आराम से अब सालाना 25 लाख रु कमाते हैं।
जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग
2005 में सुभाष पालेकर के साथ एक बैठक, जिन्हें भारत भर के कृषक समुदाय में प्यार से 'कृषि का ऋषि' के नाम से जाना जाता है, ने सब कुछ बदल दिया। एकाएक कृष्णप्पा ने रसायनों और कीटनाशकों को छोड़ दिया और जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (जेडबीएनएफ) की तरफ मुड़ गए। अपनी कुल जमीन में से पांच एकड़ में कृष्णप्पा ने प्राकृतिक तरीकों का उपयोग करके 170 से अधिक किस्मों के पेड़ सफलतापूर्वक लगाए।
25 लाख रु हो गयी सालाना इनकम
मजे की बात यह है कि 10वीं पास कृष्णप्पा ने खेती में अपना स्टाइल बदला तो उनकी वार्षिक आय को 25 लाख तक बढ़ गयी। इस तरीके में जैविक खाद, जैसे गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़ और दाल के आटे का इस्तेमाल होता है। इसमें हानिकारक उर्वरकों की जगह प्राकृतिक रूप से तैयार खाद का उपयोग करके फसलों की खेती की जाती है। इसमें सबसे बड़ी खास बात यह है कि निवेश की आवश्यकता बहुत कम होती है, जिससे किसान की आय में वृद्धि होती है।
गाय हैं जरूरी
गायें खेती के साइकिल का एक अभिन्न अंग बन गयी हैं क्योंकि वे चरने में सहायता करती हैं और उनके अपशिष्ट (मूत्र और गोबर) का उपयोग बीजों को कोट करने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया को बीजामृतम कहा जाता है। इस बीच, जीवामृतम प्रक्रिया (जिसमें गाय के गोबर और मूत्र को गुड़ और आटे के साथ मिलाया जाता है) मिट्टी के रोगाणुओं को बढ़ाता है और कीटों को दूर रखता है।
शुरुआत नहीं थी आसान
उन्होंने एक एकड़ जमीन पर प्रयोग के तौर पर जेडबीएनएफ की शुरुआत की। हालांकि, किसी भी तरह की निर्भरता से छुटकारा पाना मुश्किल है, और यही बात मिट्टी और पौधों पर भी लागू होती है। उनकी फसलें घर के बने उर्वरक के प्रति अच्छा रेस्पोंस नहीं देती थीं, और उनमें से लगभग 50% शुरुआती अवधि में ही क्षतिग्रस्त हो गए थे।
नहीं हारी हिम्मत
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मिट्टी और पौधों की आवश्यकताओं के बारे में जानने में महीनों लगाए। इस दौरान, उन्होंने अपने खेत के स्वास्थ्य का आकलन किया और मौसम और खेत की मिट्टी की स्थिति के लिए उपयुक्त बीजों का चयन किया। उन्होंने लंबे से मध्यम ऊंचाई के पेड़ों से लेकर झाड़ियों, लताओं, घास तक हर चीज की खेती की। यही बिना है कि आज वे सालाना 25 लाख रु तक कमा रहे हैं। वे मानते हैं कि जेडबीएनएफ मॉडल को अपनाने से कृषि संबंधी कई चिंताएं (जैसे भारी ऋण, कीटनाशक, मौद्रिक नुकसान, और सबसे महत्वपूर्ण किसान आत्महत्याएं) कम हो जाएंगी।
More From GoodReturns

LIC की नई पॉलिसी लॉन्च: 'बीमा प्लेटिनम' और 'जीवन रक्षा' में से कौन सी है आपके लिए बेस्ट?

EPFO Enrollment Campaign 2026: पीएफ से छूटे कर्मचारियों के लिए आखिरी मौका, 31 अक्टूबर तक करें आवेदन

पेट्रोल-डीजल के नए रेट जारी: आज आपके शहर में क्या है कीमत? जानें पूरा गणित

Gold Price 2 सितंबर को सोने-चांदी के भाव में स्थिरता, क्या आज खरीदारी करना है फायदे का सौदा? जानें ताजा रेट

3 सितंबर को सोने के दाम स्थिर: क्या आज खरीदारी करना सही फैसला है? जानें ताजा रेट

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026: 4 सितंबर को आपके शहर में बैंक बंद या खुले? चेक करें पूरी लिस्ट

गणेश चतुर्थी 2026: 14 सितंबर को बंद रहेगा शेयर बाजार, NSE-BSE की छुट्टी से ट्रेडर्स पर क्या होगा असर?

GST कलेक्शन का धमाका: ₹2 लाख करोड़ के करीब पहुंचा आंकड़ा, इन सेक्टर्स में मचेगी हलचल!

ऑटो सेल्स डेटा: मारुति-टाटा की रफ्तार पर टिकी नजर, आज इन शेयरों में दिखेगी बड़ी हलचल

MSCI रीबैलेंसिंग आज: नए शेयरों की दौड़ में फंसें या SIP का अनुशासन अपनाएं?

IMD अलर्ट: भारी बारिश में गाड़ी-घर का नुकसान? क्लेम पाने का आसान तरीका



Click it and Unblock the Notifications
