देश की प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों में से एक वोडाफोन आइडिया (VI) एक बार फिर आर्थिक परेशानियों में घिर गई है। कंपनी ने खुद इस बात के संकेत दिए हैं कि अगर सरकार ने समय रहते मदद नहीं की तो मार्च 2026 के बाद उसका कारोबार जारी रखना मुश्किल होगा।

CEO ने सरकार को लिखा पत्र
वोडाफोन आइडिया के सीईओ अक्षय मूंदड़ा ने टेलीकॉम विभाग को एक पत्र भेजा है। इस पत्र में उन्होंने कंपनी की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता जताई है और कहा है कि अगर सरकार ने एजीआर (Adjusted Gross Revenue) बकाया को लेकर कोई ठोस मदद नहीं दी तो कंपनी का भविष्य अंधेरे में है। उन्होंने यह भी साफ किया कि बैंकों से कर्ज लेने की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है, जिससे कंपनी की स्थिति और खराब हो सकती है।
सरकार के पास सबसे ज्यादा हिस्सेदारी
एक अहम बात यह है कि वोडाफोन आइडिया में 49% हिस्सेदारी सरकार के पास है। यह हिस्सा कंपनी के बकाया को इक्विटी में बदलने के बाद मिला था। ऐसे में कंपनी के गिरने का असर सिर्फ बाजार पर ही नहीं बल्कि सरकार के निवेश पर भी पड़ सकता है।
SC में पहुंची कंपनी की बकाया माफ करने की मांग
वोडाफोन आइडिया ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की है, जिसमें करीब 30,000 करोड़ रुपए के एजीआर बकाया को माफ करने की मांग की गई है। कोर्ट ने इस पर 19 मई को सुनवाई तय की है। यह याचिका कंपनी के लिए एक आखिरी कोशिश मानी जा रही है।
बिना फंडिंग नहीं बढ़ पाएगा नेटवर्क
कंपनी ने यह भी साफ किया है कि अगर उसे फंडिंग नहीं मिली, तो वह अपने नेटवर्क को बेहतर नहीं बना पाएगी। इसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ेगा क्योंकि सर्विस क्वालिटी में गिरावट आ सकती है। इससे जुड़ी निवेश योजनाएं और नेटवर्क विस्तार पर भी रोक लग सकती है।
20 करोड़ यूजर्स पर असर संभव
वोडाफोन आइडिया ने चेतावनी दी है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो उसे NCLT (दिवालियापन न्यायाधिकरण) में जाना पड़ सकता है। यह प्रक्रिया लंबी होती है और इस दौरान सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो करीब 20 करोड़ ग्राहकों को किसी अन्य नेटवर्क पर जाना पड़ेगा।
स्पेक्ट्रम और नेटवर्क की वैल्यू घटेगी
अगर कंपनी बंद होने की ओर बढ़ती है, तो उसके पास मौजूद स्पेक्ट्रम और इंफ्रास्ट्रक्चर की कीमत भी गिर जाएगी। इसका मतलब यह है कि उसकी बाजार में बची-खुची वैल्यू भी घट सकती है।
क्या है आगे का रास्ता?
वोडाफोन आइडिया की हालत वाकई गंभीर है। कंपनी के पास अब सरकार की मदद सुप्रीम कोर्ट की राहत या फिर कोई बड़ा निवेशक ही विकल्प हैं। अगर इन तीनों में से कुछ भी नहीं होता, तो भारत की तीसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी को अलविदा कहना पड़ सकता है।


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