नयी दिल्ली। देश में चल रहा लॉकडाउन कोरोनावायरस को अधिक फैलने से रोकने में मदद कर रहा है। लेकिन देश में लॉकडाउन लगा हो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। अधिकतर लोग नहीं जानते होंगे कि 19वीं और 20वीं शताब्दी में हैजा और प्लेग जैसी बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए हैदराबाद रियासत और ब्रिटिश भारत के कुछ हिस्सों में इसी तरह का लॉकडाउन लागू किया गया था। मगर तब 'लॉकडाउन' शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ था। इसके बजाय ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि सवेतन छुट्टी (Paid Holiday) हैजा को काबू रखने में मदद करेगी, जिसकी वजह से भारत के आजाद होने से पहले कई लोगों की मौत हो गई थी। उनका मानना था कि 'छुट्टी' शब्द मनोबल और स्वास्थ्य को बढ़ावा देगा।
हैदराबाद रियासत, अंग्रेजों के इमरजेंसी पास
प्लेग और हैजा के दौरान आपातकालीन स्थिति में आवाजाही के लिए हैदराबाद रियासत और अंग्रेजों के अपने अलग-अलग तरह के पास, लॉकडाउन, नियंत्रण क्षेत्र, प्रवासी श्रमिक मुद्दे, अलग अस्पताल और विशेष रास्ते थे। उनमें से ज्यादातर नियम और तरीके मौजूदा दौर में कोरोनावारस से लड़ने के लिए अब अपनाए जा रहे दिशानिर्देशों से मिलते जुलते हैं। ब्रिटिश भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार (एनएआई), नई दिल्ली और ब्रिटिश भारत के मेडिकल इतिहास अभिलेखीय आंकड़ों में आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक ब्रिटिश और निज़ाम सरकारों ने लॉकडाउन का सुझाव दिया था, क्योंकि ट्रेनों और कारवानों को संक्रामक रोगों फैलाने वाला माना जाता था। इनमें भी खास कर हैजा।
पूरे देश में नहीं था लॉकडाउन
उस समय कोई देशव्यापी लॉकडाउन नहीं था लेकिन ब्रिटिश भारत के कुछ हिस्सों में यात्री और परिवहन वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। विशेष नियंत्रण क्षेत्र (तब कॉर्डन सैनिटेयर कहा जाता था) बनाए गए थे, जिनकी देख-रेख सशस्त्र पुलिस और सैन्य कर्मि करते थे। केवल विशेष पुलिस पास (तब प्लेग पासपोर्ट कहा जाता था) वाले लोगों को इस शर्त पर शहरों में प्रवेश करने की अनुमति थी कि वे हर दूसरे दिन स्वच्छता अभियान और स्वास्थ्य जांच से गुजरें।
प्रवासी मजदूरों का मुद्दा तब भी था
आज के प्रवासी मजदूरों के मुद्दे की ही तरह ब्रिटिश भारत में भी प्रवासी मजदूरों की समस्याएं थीं। लेकिन तब ब्रिटिश और हैदराबाद अधिकारियों ने मजदूरों को उनके घरों से तीन किलोमीटर के दायरे में शिफ्ट कर दिया था ताकि उन्हें काम मिले और संक्रामक रोग की रोकथाम की निगरानी हो सके। उन्हें तब 32 दिनों का एडवांस वेतन भी दिया गया था। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक 20 मार्च 1897 को इलाहाबाद में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने मजदूरों को बीमारी से बचाने और उनके मनोबल और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए एक महीने की छुट्टी (अब लॉकडाउन) का प्रस्ताव रखा था। 500 के छोटे समूहों में मजदूरों को उनके मूल स्थानों (गांव वगेरह) में शिफ्ट कर दिया गया।
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