Middle East Tension: दुनिया आज पहले से कहीं अधिक आपस में जुड़ी हुई है। इसलिए किसी भी बड़े जियोपॉलिटिकल वॉर का असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और दूर बैठे देशों पर भी पड़ता है। अगर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है या युद्ध की स्थिति बनती है, तो उसका प्रभाव भारत पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। खासकर तेल, गैस, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में इसका असर पड़ सकता है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और महंगाई
ईरान-अमेरिका संघर्ष का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। यदि इस क्षेत्र में युद्ध या अस्थिरता बढ़ती है, तो तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 80-90% आयात करता है। इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ेगा। इस तरह महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
उद्योगों पर दबाव
कच्चा तेल सिर्फ ईंधन के रूप में ही नहीं बल्कि कई उद्योगों के लिए कच्चा माल भी है। इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से कई सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं।
- परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर- ट्रक, बस, टैक्सी और कैब सेवाओं की लागत बढ़ेगी।
- एयरलाइन इंडस्ट्री- विमान ईंधन (ATF) महंगा होने से हवाई टिकट महंगे हो सकते हैं।
- प्लास्टिक और केमिकल इंडस्ट्री- प्लास्टिक, पॉलिएस्टर, नायलॉन, पेंट और रेज़िन की लागत बढ़ सकती है।
- ऑटोमोबाइल सेक्टर- सिंथेटिक रबर, लुब्रिकेंट और टायर निर्माण महंगा हो सकता है।
- कंस्ट्रक्शन सेक्टर- सड़क निर्माण और अन्य निर्माण सामग्री की लागत बढ़ सकती है।
इस प्रकार तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का प्रभाव लगभग हर उद्योग पर पड़ सकता है।
वैश्विक व्यापार और भारत का निर्यात
मध्य-पूर्व का हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। अगर संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो वैश्विक व्यापार प्रभावित हो सकता है। भारत का लगभग 25% समुद्री व्यापार इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। अगर जहाजों को वैकल्पिक रास्तों से जाना पड़े, तो परिवहन समय 14 से 20 दिन तक बढ़ सकता है। इससे शिपिंग लागत बढ़ेगी और भारतीय निर्यात पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
प्राकृतिक गैस और कृषि पर असर
तेल के अलावा प्राकृतिक गैस भी इस संकट का बड़ा मुद्दा बन सकती है। कतर दुनिया के सबसे बड़े LNG (Liquefied Natural Gas) निर्यातकों में से एक है और एशियाई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है। भारत को बड़ी मात्रा में गैस सप्लाई करता है। अगर युद्ध के कारण गैस उत्पादन या सप्लाई बाधित होती है, तो भारत में उर्वरक उद्योग प्रभावित हो सकता है, क्योंकि उर्वरक उत्पादन में गैस का महत्वपूर्ण उपयोग होता है। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसके अलावा घरेलू रसोई गैस (LPG) की उपलब्धता और कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती
भारत के पास तेल का सीमित रणनीतिक भंडार है। अन्य देशों की तुलना में भारत का तेल भंडारण अपेक्षाकृत कम है। अगर लंबे समय तक वैश्विक आपूर्ति बाधित रहती है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। इसलिए ऊर्जा भंडारण क्षमता बढ़ाना और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देना आवश्यक है।
कब तक चलेगी युद्ध?
Pentagon को लग रहा है कि यह छोटा ऑपरेशन नहीं बल्कि महीनों चलने वाला संघर्ष बन सकता है। युद्ध 4-5 हफ्ते नहीं बल्कि कई महीने चल सकता है
Bloomberg और अन्य रिपोर्टों में मुख्य चिंता तेल और शिपिंग को लेकर बताई गई है। Strait of Hormuz से दुनिया के लगभग 20% तेल का परिवहन होता है। युद्ध के कारण कई जहाज इस रास्ते से गुजरने से डर रहे हैं और शिपिंग लगभग रुक गई है। जोखिम इतना बढ़ गया कि अमेरिका को जहाजों के लिए 20 बिलियन डॉलर तक का बीमा (reinsurance) देने की योजना बनानी पड़ी।
ईरान-अमेरिका संघर्ष भले ही भारत से हजारों किलोमीटर दूर हो, लेकिन उसके प्रभाव से भारत पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि, उद्योगों पर दबाव, व्यापार मार्गों में बाधा और कृषि क्षेत्र पर असर-ये सभी संभावित चुनौतियां हैं।
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