नयी दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सोमवार को म्यूचुअल फंड्स की मदद करने के लिए 50,000 करोड़ रुपये की स्पेशल लिक्विडिटी विंडो का ऐलान किया। म्यूचुअल फंड्स को डेब्ट फंड सेगमेंट में उथल-पुथल से झटका लगा। इसी वजह से फ्रैंकलिन टेम्पलटन म्यूचुअल फंड ने 6 क्रेडिट जोखिम फंडों को बंद कर दिया। स्पेशल लिक्विडिटी फैसलिटी म्यूचुअल फंड (एसएलएफ-एमएफ) के तहत आरबीआई निर्धारित रेपो दर पर 90 दिनों की अवधि के रेपो ऑपरेशन करेगा। रेपो (रीपर्चेज एग्रीमेंट) ऑपरेशन सरकारी सिक्योरिटीज में डीलरों के लिए छोटी अवधि के लोन का एक रूप है। एसएलएफ-एमएफ के लिए आरबीआई की ये खास विंडो 11 मई या 50000 करोड़ रुपये के आवंटन, जो भी पहले हो, तक खुली रहेगी। एसएलएफ-एमएफ के तहत मिलने वाले फंड का इस्तेमाल बैंकों द्वारा विशेष रूप से म्यूचुअल फंड्स की लिक्विडिटी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाएगा।
बैंक इस पैसे का क्या करेंगे
बैंक इन पैसों को लोन के रूप में म्यूचुअल फंड्स को देंगे और म्यूचुअल फंड के निवेश ग्रेड कॉर्पोरेट बॉन्ड, वाणिज्यिक पत्र (सीपी), डिबेंचर और प्रमाण पत्र के बदले रेपो को सीधी खरीदारी कर सकते हैं।
आरबीआई ने क्यों दी ये फैसिलिटी
कोरोनावायरस के रेस्पोंस में पूंजी बाजारों में अधिक अस्थिरता की वजह से म्यूचुअल फंडों पर लिक्विडिटी का दबाव बढ़ गया, जिसमें फ्रैंकलिन टेम्पलटन द्वारा 6 डेब्ट स्कीम बंद करने के मद्देनजर बाकी म्यूचुअल फंड स्कीमों में से निवेशकों द्वारा पैसे निकालने की संभावना से और बढ़ोतरी हुई। हालांकि आरबीआई के मुताबिक अभी दिक्कत सिर्फ उच्च जोखिम वाले डेब्ट म्यूचुअल फंड सेगमेंट तक ही सीमित है, जबकि म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के बड़े हिस्से में लिक्विडिटी की कोई समस्या नहीं है।
क्या पड़ेगा इस फैसिलिटी का असर
आरबीआई के लिक्विडिटी ऑफर से डेब्ट मार्केट को कुछ हद तक आराम मिलने की उम्मीद है। खास कर क्रेडिट रिस्क फंड श्रेणी में, जिसमें 55,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है। वैसे भी डेब्ट फंड में से मार्च में निवेशकों ने 1.94 लाख करोड़ रुपये की राशि निकाल ली।
क्या हैं आरबीआई के ऑफर की बाकी खासियतें
आरबीआई का कहना है कि इस सुविधा के अंतर्गत बड़े एक्सपोज़र फ्रेमवर्क (एलईएफ) के तहत लोन नहीं दिया जाएगा, जिससे बैंक को इस विंडो के तहत उधार लेने के लिए सहूलियत मिलेगी। इसके अलावा एसएलएफ-एमएफ के तहत म्यूचुअल फंड्स को मिलेन वाली आर्थिक मदद को बैंकों की पूंजी बाजार जोखिम लिमिट से मुक्त रखा जाएगा। यानी बैंकों पर लोन देने के लिए जोखिम लिमिट की बंदिश नहीं होगी।
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