US Reciprocal Tariffs Impact: अमरेिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप शपथग्रहण के बाद से ही टैरिफ को लेकर आक्रामक नजर आ रहे. चीन, कनाडा, मैक्सिको पर टैरिफ का ऐलान किया. फिर स्टील और एल्युमीनियम इंपोर्ट पर टैरिफ लगाया. उसके बाद रेसिप्रोकल टैरिफ (Reciprocal Tariffs) का ऐलान किया, जिससे संभावित ट्रेड वॉर की स्थिति बन गई है. इस टैरिफ का मतलब है कि अन्य देश जैसे टैरिफ अमेरिकी गुड्स पर लगाएंगे वैसा ही टैरिफ अमेरिका भी उन देशों के सामानों पर लगाएगा.
रेसिप्रोकल टैरिफ के ऐलान के बाद भारत और अमेरिका के बीच होने वाले ट्रेड पर भी नजर है. क्योंकि इसका असर दोनों देशों के ट्रेड पर भी नजर आ आएगा. इसको लेकर ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने एनलिसिस किया है.
अमेरिकी टैरिफ का भारत पर असर
ब्रोकरेज फर्म के मुताबिक अमेरिका की ओर से लागू पारस्परिक टैरिफ अन्य देशों के साथ टैरिफ, करों और नॉन-टैरिफ बाधाओं को संतुलित करने का लक्ष्य रखती है. अगर अमेरिका सभी इंपोर्ट पर एवरेज टैरिफ गैप से टैरिफ बढ़ाता है, तो भारतीय इंपोर्ट्स पर प्रभावी टैरिफ दरों में 6.5% का इजाफा हो सकता है.
पिछले एक दशक में अमेरिका के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस (Trade Surplus) काफी बढ़ा है. वित्त वर्ष 2014 में 17 बिलियन डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 35 बिलियन डॉलर हो गया, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 1.0% है. यह ग्रोथ मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक आइटम के ट्रेड में बढ़ोतरी की वजह है, जिसे 2020 में शुरू की गई पीएलआई योजना से राजकोषीय प्रोत्साहन मिला है.
रेसिप्रोकल टैरिफ पर ब्रोकरेज फर्म
गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) पारस्परिक टैरिफ लागू करने के लिए तीन संभावित नजरियों का उल्लेख करता है. इसमें देश-स्तरीय पारस्परिकता, उत्पाद-स्तरीय पारस्परिकता और गैर-टैरिफ बाधाओं को शामिल करना है. देश-स्तरीय पारस्परिकता एक विशिष्ट देश और अमेरिका के बीच औसत टैरिफ अंतर से सभी आयातों पर टैरिफ बढ़ाने का सुझाव देती है. इससे भारतीय आयातों पर अमेरिकी प्रभावी टैरिफ दरों में लगभग 6.5% की ग्रोथ हो सकती है।
उत्पाद-स्तरीय पारस्परिकता में ट्रेड पार्टनर्स द्वारा लगाए गए टैरिफ दरों के साथ व्यक्तिगत उत्पादों पर टैरिफ दरों को समान करना शामिल है. इससे भारतीय आयातों पर अमेरिकी प्रभावी टैरिफ दरों में 11.5 प्रतिशत अंक की वृद्धि हो सकती है. तीसरा दृष्टिकोण गैर-टैरिफ बाधाओं को शामिल करता है, जो प्रत्येक ट्रे़ पार्टनर के लिए इन लागतों को निर्धारित करने में कठिनाइयों के कारण जटिल है.

2023 में भारत का अमेरिका को निर्यात उसके GDP का लगभग 2.0% है, जिससे भारत उभरते बाजार अर्थव्यवस्थाओं में न्यूनतम जोखिम वाला देश है. आर्थिक प्रभाव को समझने के लिए यह विश्लेषण करना होगा कि भारतीय निर्यात अमेरिकी टैरिफ में बदलावों पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं, भारतीय वस्तुओं के लिए अमेरिकी मांग की कीमत लोच पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
विश्लेषण बताता है कि भारतीय आयात पर अमेरिकी टैरिफ में विभिन्न स्तरों की वृद्धि से विभिन्न परिदृश्यों में भारत के GDP विकास में 0.1-0.3 प्रतिशत अंक की कमी आ सकती है. यदि अमेरिका सभी देशों में एक सार्वभौमिक पारस्परिक टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिकी अंतिम मांग के लिए भारत के सकल निर्यात में घरेलू मूल्य वर्धित सामग्री GDP का लगभग 4.0% है.
घरेलू प्रभाव और नीतिगत फोकस
यह मीट्रिक अमेरिकी टैरिफ के जोखिम के संबंध में भारत को अपने एशियाई समकक्षों के बीच केंद्रीय स्थान पर रखता है. अमेरिकी औसत प्रभावी टैरिफ दरों में 6.5-11.5 प्रतिशत अंक की वृद्धि को देखते हुए घरेलू GDP विकास पर संभावित प्रभाव 0.1 और 0.6 प्रतिशत अंक के बीच होने की संभावना है.
विश्लेषण अमेरिकी टैरिफ का भारत पर महत्वपूर्ण प्रभाव होने की बात को उजागर करता है, जो उनके व्यापार गतिशीलता की जटिलताओं और संभावित आर्थिक प्रभावों पर जोर देता है. वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत के ट्रेड सरप्लस और स्थिति के साथ, विकसित टैरिफ परिदृश्य चुनौतियां और नीतिगत फोकस के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र प्रस्तुत करता है.
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