अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया आदेश ने एक बार फिर एच1-बी वीजा धारकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। इस आदेश के तहत अब नए एच1-बी वीजा आवेदकों को 1 लाख डॉलर (लगभग ₹83 लाख) तक का शुल्क देना होगा।
इस फैसले का विरोध करते हुए कई अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप को पत्र लिखकर कहा है कि यह नीति अमेरिका की तकनीकी बढ़त और भारत के साथ उसके रिश्तों दोनों के लिए हानिकारक साबित हो सकती है।

सांसदों ने जताई नाराजगी
कांग्रेस के सदस्य जिमी पनेटा, अमी बेरा, सालुद कार्बाजल और जूली जॉनसन ने राष्ट्रपति ट्रंप को लिखे पत्र में कहा कि नया वीजा शुल्क विदेशी पेशेवरों के लिए बाधा बन सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे अमेरिका की आईटी और एआई इंडस्ट्री को नुकसान हो सकता है, क्योंकि इनमें भारतीय पेशेवरों की भूमिका सबसे अहम रही है।
सांसदों का कहना है कि एच1-बी वीजा प्रोग्राम ने दशकों से अमेरिकी कंपनियों को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी प्रतिभाशाली लोगों से जोड़े रखा है, और इस पर किसी तरह की रोक लगाना इनोवेशन की रफ्तार को धीमा कर देगा।
क्यों उठी यह चिंता
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में घोषणा की थी कि कुछ गैर-प्रवासी कामगारों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगाई जाएगी और नए वीजा आवेदन पर भारी शुल्क लगाया जाएगा। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि इससे अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन सांसदों का मानना है कि यह नीति उलटी पड़ सकती है, क्योंकि बड़ी टेक कंपनियां भारतीय इंजीनियरों और डेवलपर्स पर काफी निर्भर हैं।
चीन से मुकाबले पर भी पड़ सकता है असर
सांसदों ने चेताया कि जब चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस टेक्नोलॉजी में बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है, ऐसे समय में अमेरिका को वैश्विक प्रतिभाओं को अपने साथ जोड़ने की जरूरत है। अगर अमेरिका विदेशी एक्सपर्ट्स पर पाबंदी लगाता है, तो इसका फायदा चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं को मिलेगा और अमेरिका की तकनीकी बढ़त कमजोर पड़ जाएगी।
भारत की भूमिका और रणनीतिक रिश्ते
सांसदों ने कहा कि अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवर न सिर्फ अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि भारत-अमेरिका के रणनीतिक संबंधों को भी मजबूत बना रहे हैं। पिछले वर्ष जारी एच1-बी वीजा में से लगभग 70% भारतीय नागरिकों को मिले थे, जो इस प्रोग्राम में भारत की अहमियत दिखाता है।
ट्रंप से पुनर्विचार की मांग
सांसदों ने अपने पत्र में कहा कि वे ट्रंप से उम्मीद करते हैं कि वे इस फैसले को अस्थायी रूप से स्थगित करें और उस पर फिर से विचार करें। उनका मानना है कि यह नीति अमेरिकी कंपनियों के लिए प्रतिभा की कमी पैदा कर सकती है और भारत जैसे सहयोगी देश के साथ संबंधों में खटास ला सकती है।
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