नयी दिल्ली। आज हम जो भोजन करते हैं उसका ज्यादातर रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करके उगाया जाता है। इस पर जहरीला कीटनाशक भी छिड़का जाता है, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि इसका फौरन असर न हो, मगर कुछ समय में नुकसान सामने आ सकते हैं। 1985 में तब 42 साल के एक व्यक्ति ने ऐसा ही केमिकल बनाना शुरू किया। उसकी सेल्स काफी अधिक पहुंच गयी। मगर एक घटना ने उनका मन बदल दिया और उन्होंने जैविक खाद का इस्तेमान करने की सोची। इस सोच से ही उनकी कमाई आज करोड़ों रु में पहुंच गयी है। आइए जानते हैं पूरी कहानी।
क्या थी वो घटना
ये कहानी है महाराष्ट्र के 77 वर्षीय जयंत बर्वे की। फिजिक्स के स्नातक जयंत के पास सीएसआईआर-एनसीएल (वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान-राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला परिषद) में काम करने का अनुभव है। अपने केमिकल की बिक्री से वे काफी खुश थे। मगर एक घटना ने उनका मन बदल दिया। एक बार उनके पास एक किसान आया, जो अंगूर उगा रहा था। मगर कौवे उसकी फसल को नुकसान पहुंचा रहे थे। उसने बर्वे से एक ऐसा केमिकल मांगा, जिससे कौवे अंगूर खाने पर मर जाएं। एक बार जब कौवा फूड प्वाइजनिंग से मर जाएगा, तो दूसरे कौवे समझेंगे कि ये खाना असुरक्षित है और इन अंगूरों को नहीं खाना चाहिए।
बर्वे को लगा झटका
उस किसान की ये मांग बर्वे को झटका देने वाली थी। उन्हें एक सख्त रसायन का एहसास हुआ। ऐसा रसायन, जो पक्षी को मार डाले उसका मनुष्यों पर भी समान रूप से हानिकारक प्रभाव पड़ेगा। उद्यमी ने किसान की बात नहीं मानी। अगले कुछ वर्षों में जयंत ने अपनी नोलेज को जैविक खाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने खेतों में केमिकल उर्वरक के बजाय जैविक खाद के इस्तेमाल को बढ़ाने का प्रयास किया।
10 करोड़ रु है कमाई
अब, भारत के विभिन्न राज्यों के साथ केन्या और नामीबिया जैसे देशों में में भी जैविक उर्वरक की खूब मांग है और इससे जयंत को सालाना 10 करोड़ रुपये की कमाई होती है। हालांकि जयंत की अंतरात्मा एक घटना के बाद रातोंरात बदल गई, लेकिन किसानों की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाने में लगभग तीन दशक लग गए।
पहले खुद किया ट्राई
शुरुआत करने के लिए जयंत ने अपनी बंजर पैतृक भूमि पर जैविक खेती के साथ प्रयोग करने का फैसला किया। द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अपने जीवन में कभी फसल नहीं उगाई थी, लेकिन पुणे में जानकारों की मदद से उन्होंने जैविक फसल के बारे में काफी जानकारी हासिल की थी। जयंत ने अंगूर को ऑर्गेनिक रूप से उगाने का फैसला किया। उन्होंने किताबें पढ़ीं, पुणे में विशेषज्ञों से मुलाकात की, सेमिनारों और कार्यशालाओं में भाग लिया, और वर्मीकम्पोस्ट विधियों का अभ्यास करना शुरू किया। तकनीक से अच्छे नतीजे मिले और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ।
बंद किया कीटनाशक बिजनेस
भूमि की स्थिति में सुधार हुआ। अंगूर के साथ, उन्होंने अनार, चीकू, आम और केला भी उगाना शुरू किया। उन्होंने 1991 में कीटनाशक व्यवसाय को भी बंद कर दिया। नौ साल के परीक्षण के बाद 30 एकड़ खेत में किए गए शोध और सफल परिणाम उन्होंने मनचाहा उत्पाद हासिल किया। जैविक खाद पोषक तत्वों से भरपूर रहे और आज वो करोड़ो रु कमा रहे हैं।


Click it and Unblock the Notifications