नयी दिल्ली। टाटा ग्रुप की आईटी कंपनी टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) ने मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज को पीछे छोड़ दिया है। टीसीएस एक बार फिर से मार्केट कैपिटल या बाजार पूंजी के मामले में रिलायंस को पछाड़ कर नंबर 1 बन गयी है। इसकी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आयी गिरावट के कारण रिलायंस का शेयर धड़ाम होना है। आज रिलायंस के शेयर में 12 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आयी है, जिससे इसकी बाजार पूंजी 7,05,655.56 लाख करोड़ रुपये पर आ गयी है। वहीं टीसीएस के शेयर में भी भारी गिरावट आयी है। मगर फिर भी यह रिलायंस के मुकाबले कम गिरा है। टीसीएस के शेयर में करीब 7 फीसदी की गिरावट आयी और इसकी बाजार पूंजी 7,40,045.31 करोड़ रुपये पर है।
कहां हैं दोनों कंपनियों के शेयर
सोमवार को शेयर बाजार बंद होने पर रिलायंस का शेयर 156.90 रुपये या 12.35 फीसदी की गिरावट के साथ 1,113.15 रुपये पर बंद हुआ, जबकि टीसीएस का शेयर 145.70 रुपये या 6.88 फीसदी लुढ़ कर 1972.20 रुपये पर बंद हुआ। आज शेयर में बाजार में भारी गिरावट आयी। सेंसेक्स आज 1941.67 अंकों या 5.17 फीसदी की भारी भरकम गिरावट के साथ 35,634.95 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 538 अंकों या 4.90 फीसदी की गिरावट के साथ 10,451.45 पर बंद हुआ।
इसलिए गिरा रिलायंस का शेयर
बता दें कि कच्चे तेल की कीमतों में 1991 में हुए खाड़ी युद्ध के सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गयी है। ऐसा सऊदी अरब की तरफ से रूस के साथ प्राइस वॉर शुरू करने के कारण हुआ है। सऊदी अरब ने अपने सेलिंग प्राइस में बड़ी कटौती की है। कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त गिरावट के चलते ही रिलायंस का शेयर नीचे गिर गया, क्योंकि इससे कंपनी की तेल आमदनी प्रभावित होगी। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर 14.25 डॉलर या 31.5 फीसदी गिर कर 31.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। ये 17 जनवरी 1991 को शुरू हुए खाड़ी युद्ध के बाद कच्चे तेल की कीमतों में प्रतिशत में सबसे बड़ी गिरावट है।
हजारों करोड़ रु के फायदे में रहेगा भारत
सऊदी अरब और रूस के बीच मुकाबले से कच्चे तेल की कीमतों में आयी गिरावट से भारत को फायदा मिलेगा। अपनी जरूरत का भारत करीब 83 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। कच्चे तेल के दाम में इस भारी गिरावट से भारत को करीब 3,000 करोड़ रुपये का लाभ होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतें पूरे 2020-21 में दबाव में रहेंगी और इनके 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने की उम्मीद नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब के कीमतें घटाने के बाद अन्य देश भी कीमतों में कटौती कर सकते हैं।
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