Reliance Power Banned News: सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) ने अनिल अंबानी को बड़ा झटका दिया है। रिलायंस पावर और रिलायंस एनयू बीईएसएस लिमिटेड को कथित रूप से 'फेक डॉक्यूमेंट' जमा करने के लिए सरकारी सौर कंपनी सेकी की निविदाओं में हिस्सा लेने के लिये तीन साल के लिए रोक दिया गया है। इससे पहले भी सेबी ने अनिल अंबानी को सिक्योरिटी मार्केट से पांच साल के लिए बैन कर दिया था। आइए इसके बारे में आपको सारी डिटेल्स देते हैं।
ये है पूरा मामला
सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ने जानकारी देकर बताया है कि, 'महाराष्ट्र एनर्जी जेनरेशन, जिसे रिलायंस एनयू बीईएसएस (एक परियोजना के लिए) के रूप में जाना जाता है। कंपनी की तरफ से पेश किए गए डॉक्यूमेंट के वेरिफिकेशन में यह पाया गया कि निविदा शर्तों के अनुरूप बोलीदाता की तरफ से प्रस्तुत ईएमडी (एक विदेशी बैंक द्वारा जारी) के एवज में दी गई बैंक गारंटी फर्जी थी।'
यह मामला सेकी की तरफ से आयोजित प्रतिस्पर्धी बोली के तहत 1,000 मेगावाट/ 2,000 मेगावाट घंटे की एकल आधार वाली बीईएसएस प्रोजेक्ट की स्थापना के लिए जारी किए गए चयन संदर्भ (RFS) से संबंधित है। मिंट के अनुसार, 4 नवंबर को बताया कि रिलायंस पावर की सहायक कंपनी द्वारा प्रस्तुत किए गए फर्जी दस्तावेजों के कारण टेंडर रद्द कर दिया गया।
Anil Ambani Reliance Power: सेकी ने कहा कि उसने रिलायंस पावर और रिलायंस एनयू बीईएसएस को तीन साल की अवधि में जारी होने वाली निविदाओं में हिस्सा लेने से रोक दिया है. निविदा शर्तों के अनुसार फर्जी डॉक्यूमेंट्स पेश करने की वजह से बोलीदाता को भविष्य की निविदाओं में शामिल होने से वंचित किया जा सकता है।

अनिल अंबानी ग्रुप ने पिपावाव शिपयार्ड को खरीदने के लिए किया था निवेश
रिलायंस पावर के पास 5300 मेगावाट का कमीशन पोर्टफोलियो है। 6 नवंबर को रिलायंस पावर की सहायक कंपनी रोजा पावर सप्लाई कंपनी लिमिटेड ने घोषणा की कि उसने सिंगापुर स्थित लोन प्रोवाइडर वर्डे पार्टनर्स को 485 करोड़ रुपये का लोन अग्रिम भुगतान कर दिया है, जिससे उसे जीरो-लोन स्थिति प्राप्त हो गई है। इससे पहले सितंबर में, रोजा पावर ने वर्डे पार्टनर्स को 833 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया था।
इसके अलावा, अनिल अंबानी ग्रुप ने 2016 में पिपावाव शिपयार्ड को खरीदने में भी भारी निवेश किया था, जिसे बाद में रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग का नाम दिया गया। हालांकि, समूह कोई बदलाव नहीं कर सका और बाद में लोन लेंडर्स को दिवाला एवं दिवालियापन संहिता के तहत शिपयार्ड को बेचना पड़ा। रिलायंस कम्युनिकेशंस और रिलायंस कैपिटल के दिवालिया होने से समूह की वित्तीय संभावनाओं को और नुकसान पहुंचा है।
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