Mutual Funds Expense Ratio: निवेशकों का फायदा ही फायदा! SEBI ने म्यूचुअल फंड्स एक्सपेंस रेश्यो में की कटौती

Mutual Funds Expense Ratio: म्यूचुअल फंड निवेशकों को बड़ी राहत देते हुए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने व्यय अनुपात यानी एक्सपेंस रेशियो में कटौती का फैसला लिया है।

बाजार नियामक का यह कदम एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) की मांगों के अनुरूप है, ताकि ब्रोकरेज लागत पर प्रस्तावित सीमा व्यावहारिक बन सके। अब एक्सपेंस रेशियो को Base Expense Ratio (BER) कहा जाएगा, जिसमें GST, STT, स्टैंप ड्यूटी जैसी स्टैट्यूटरी लेवी शामिल नहीं होंगी (ये अलग से लगेंगी)।

Mutual Funds expense ratio

एक्सपेंस रेशियो क्या होता है? (What Is Expense Ratio)

एक्सपेंस रेशियो फंड प्रबंधन, प्रशासन और अन्य खर्चों का वार्षिक शुल्क है। पहले टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) में सभी कानूनी-ब्रोकरेज चार्ज शामिल थे। सेबी ने स्पष्ट किया है कि अब ब्रोकरेज, नियामक व कानूनी देनदारियां BER के अतिरिक्त अलग से जोड़ी जाएंगी, जबकि इसकी अधिकतम सीमा घटा दी गई है। इससे फंड की लागतों में पारदर्शिता बढ़ेगी।

किन कैटेगरी के फंड्स में कितनी हुई कटौती?

  • इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF): पहले 1% (कानूनी शुल्क सहित), अब 0.90% (कानूनी शुल्क रहित) हो गया है।
  • फंड ऑफ फंड्स (FoF): पहले 1%, अब 0.90% हो गया है।
  • इक्विटी ओरिएंटेड स्कीम्स यानी AUM का 65% या अधिक इक्विटी में निवेश: पहले 2.25% और अब 2.10% हो गया है।
  • अन्य फंड ऑफ फंड्स: पहले 2% और अब 1.85% हो गया है।
  • क्लोज्ड-एंडेड इक्विटी स्कीम्स: 1.25% से 1%
  • ब्रोकरेज कैप आधा: कैश मार्केट में 12 bps से 6 bps, डेरिवेटिव्स में 5 bps से 2 bps।
  • एग्जिट लोड पर अतिरिक्त 5 bps चार्ज पूरी तरह हटाया।

एक्सपेंस रेशियो घटने से निवेशकों को कितना फायदा?

म्यूचुअल फंड्स के एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) में कटौती से निवेशकों को सीधा और बड़ा फायदा होता है। यह फंड मैनेजमेंट की वार्षिक फीस होती है, जो फंड के रिटर्न से काट ली जाती है। कम एक्सपेंस रेशियो का मतलब है कि आपके निवेश पर कम खर्च कटेगा, जिससे नेट रिटर्न ज्यादा मिलेगा।

हाई नेट रिटर्न - एक्सपेंस रेशियो कम होने से फंड का NAV (Net Asset Value) ज्यादा बढ़ता है, क्योंकि कम पैसा फीस में जाता है। लंबी अवधि में कंपाउंडिंग की वजह से यह फर्क बड़ा हो जाता है।

उदाहरण: मान लीजिए दो फंड्स में 12% ग्रॉस रिटर्न है:

  • फंड A: एक्सपेंस रेशियो 1.5% → नेट रिटर्न ~10.5%
  • फंड B: एक्सपेंस रेशियो 1.0% → नेट रिटर्न ~11.0%

₹1 लाख निवेश पर 20 साल में (12% ग्रॉस रिटर्न मानकर):

  • 1.5% एक्सपेंस रेशियो वाले फंड में कॉर्पस ~₹8.7 लाख
  • 1.0% एक्सपेंस रेशियो वाले में ~₹9.6 लाख
  • फर्क: ~₹90,000 (करीब 10% ज्यादा)!

सिर्फ 0.5% कटौती से भी लंबे समय में लाखों का फर्क पड़ सकता है।

  1. पारदर्शिता बढ़ती है - कम फीस से निवेशक साफ देख सकते हैं कि उनका पैसा कहां खर्च हो रहा है।
  2. कुल मिलाकर ज्यादा बचत - खासकर SIP या लंबे निवेश में, कम एक्सपेंस रेशियो वाले फंड (जैसे इंडेक्स फंड्स, ETFs) ज्यादा वेल्थ बनाते हैं।

नोट: यह बदलाव निवेशकों के लिए लागत कम करेंगे और पारदर्शिता बढ़ाएंगे। हालांकि कुल TER में स्टैट्यूटरी चार्जेस अलग से जोड़े जाएंगे, लेकिन AMC की कोर फीस (BER) कम होने से फायदा होगा। एक्सपेंस रेशियो में कटौती से निवेशकों को ज्यादा रिटर्न मिलता है, खासकर लंबी अवधि में। हमेशा कम एक्सपेंस रेशियो वाले फंड चुनें (खासकर डायरेक्ट प्लान), लेकिन फंड का परफॉर्मेंस, रिस्क और अपना गोल भी देखें। SEBI के नए नियमों से यह फायदा और बढ़ेगा!

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