Rupee hits record low against dollar: अमेरिकी बांड यील्ड बढ़ोतरी के कारण आज धनतेरस वाले दिन एशियाई देशों सहित भारत की मुद्रा डॉलर के खिलाफ कमजोरी के साथ बंद हुई। आज कमजोरी के कारण भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है।
आज डॉलर के खिलाफ रुपया 6 पैसे की कमजोरी के साथ 83.34 रुपये के स्तर पर बंद हुआ। वहीं आज दोपहर 1:55 बजे घरेलू मुद्रा बाजार में83.40 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर तक गिर गया था। यह रुपये का सबसे निचला ट्रेडिंग लो स्तर है। वहीं डॉलर के खिलाफ रुपये का बंद होने का रिकॉर्ड निचला स्तर 83.29 रुपये का है। वहीं डीलरों ने कहना है कि रुपया 83.50 प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है, क्योंकि मार्केट में डॉलर की सप्लाई कम है।

भारतीय रुपये सहित एशियाई देशों की करेंसी में गिरावट फेडरल रिजर्व के सदस्यों के इस बयान के बाद आई कि वे अभी भी आश्वस्त नहीं हैं कि ब्याज दरें अमेरिका में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त ऊंची हैं या इसे और बढ़ाना पड़ सकता है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी में ट्रेजरी के प्रमुख और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली के अनुसार डॉलर की कमी और लगातार आयातकों की खरीदारी के कारण डॉलर और रुपया नए उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। उनके अनुसार लग रहा है कि यह स्तर 83.50 रुपये के स्तर पर तक जा सकता है।
माना जाता है जिस देश के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार होता है, उस देश की आर्थिक स्थिति भी अच्छी मानी जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि अगर दुनिया में कोई दिक्कत आ जाए तो देश अपनी जरूरत का सामान कई माह तक आसानी से मंगा सकता है। इसीलिए दुनिया के बहुत से देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को काफी मजबूत बना कर रखते हैं। विदेशी मुद्रा भंडार में निर्यात के अलावा विदेशी निवेश से डॉलर या अन्य विदेशी मुद्रा आती है। इसके अलावा भारत लोग जो विदेश में काम करते हैं, उनकी तरफ से भेजी गई विदेशी मुद्रा भी बड़ा स्रोत होती है।
लेकिन लगातार आयात बढ़ने के चलते देश आयातकों की तरफ से डॉलर की इस वक्त भारी मांग है, लेकिन बाजार में डॉलर की कमी है। रिजर्व बैंक इस बार डॉलर की आपूर्ति नहीं बढ़ा रहा है। ऐसे में मांग बढ़ने के कारण डॉलर मजबूत हो रहा है।
भारत 1947 में आजाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दाम बराबर का था। मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया था। तब देश पर कोई कर्ज भी नहीं था। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये। 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा।
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