RBI MPC Meet Decision on Cash Reserve Ratio: कैश रिजर्व रेशो पर आया आरबीआई का फैसला, जानें क्या है सीआरआर?

Cash Reserve Ratio: भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी ने इस बार भी रेपो रेट में बदलाव नहीं किया है। लगातार 11वीं बार रेपो रेट को 6.5% पर बरकार रखा गया है। आपको बता दें कि अगर आरबीआई द्वारा रेपो रेट में बदलाव नहीं किया जाता तो लोन सस्ते नहीं होंगे और ब्याज दरें भी वैसे ही बनी रहती। वहीं, आरबीआई ने सीआरआर(कैश रिजर्व रेश्यो) में बदलाव किया है।

इस बार CRR 0.50% घटाकर 4% कर दिया है। कटौती से पहले CRR 4.5% था। CRR किसी बैंक की कुल जमा राशि का वह प्रतिशत है, जिसे बैंक को लिक्विड कैश में RBI के पास रिजर्व के तौर पर रखना होता है। CRR को एडजस्ट करके, RBI लिक्विडिटी और उधार को नियंत्रित कर सकता है। आइए अब आपको बताते हैं कि आखिर कैश रिजर्व रेश्यो क्या होता है।

Cash Reserve Ratio

कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) क्या है?

हर बैंक को अपनी कुल जमा राशि का एक हिस्सा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास रिजर्व के तौर पर रखना पड़ता है और इस हिस्से को किसी बैंक का सीआरआर कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में तरलता यानी लिक्विडिटी को कंट्रोल करना, महंगाई को संभालना और अत्यधिक ऋण वितरण (excessive lending) पर लगाम लगाना है।

वर्तमान में यह प्रतिशत 4 पर रखा गया है। इससे पहले ये 4.5% पर था। CRR से जुड़े नियम इसी वजह से बनाए गए हैं, ताकि अगर किसी भी समय किसी बैंक से अचानक बड़ी तादाद में जमाकर्ता रकम निकालने पहुंच जाएं, तो बैंक पैसा चुकाने से इंकार नहीं कर पाए। CRR वह साधन है, जिसकी मदद से रिवर्स रेपो रेट में बदलाव किए बिना RBI बाज़ार से नकदी की तरलता घटा सकता है।

सीआरआर घटाने से क्या होगा?

सीआरआर घटाने से बैंकों के पास ज्यादा कैश उपलब्ध हो जाती है, जिससे वे कर्ज बांटने और अन्य कारोबार को बढ़ाकर अतिरिक्त आय कमा सकते हैं और इससे बैंकों के मार्जिन में भी सुधार होता है।

CRR बढ़ने पर क्या होता है?

दूसरी तरफ, CRR बढ़ने की हालत में सभी बैंकों को RBI के पास ज़्यादा बड़ी रकम रखनी होती, और बैंक के पास कर्ज़ देने के लिए रकम कम हो जाती। वहीं, बाजार में नकदी बढ़ाने के लिए CRR को घटाया जाता है।

CRR में बदलाव उसी हालत में किया जाता है, जब बाजार में नकदी की तरलता पर तुरंत प्रभाव नहीं डालना हो, क्योंकि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव का असर जितना जल्दी बाजार पर पड़ता है, CRR में बदलाव का असर उससे कहीं ज़्यादा वक्त लिया करता है।

अगर आरबीआई सीआरआर बढ़ाता तो इसका मतलब है कि बैंकों को रिजर्व बैंक के पास अधिख कैश रखना होता। यानी बैंकों के पास पैसा कम बचता और पैसा कम होगा तो उसके लोन देने की क्षमता कम हो जाती, बैंक लोन कम देगा तो बाजार में पैसे का प्रवाह घटेगा और कीमतों में गिरावट आएगी और महंगाई कम होगा।

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