नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने अपनी मॉनिटरी पॉलिसी की आज यानी 4 दिसंबर 2020 को घोषणा की। यह लगातार तीसरी बार है जब नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। मौद्रिक नीति की घोषणा करने के दौरान आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया कि इंटरेस्ट रेट्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है। ऐसे में रेपो रेट 4 फीसदी पर और रिवर्स रेपो रेट 3.35 फीसदी पर बनी रहेंगी। वहीं रिजर्व बैंक ने कहा है कि अगर जरूरत पड़ी तो भविष्य में रेपो रेट में बदलाव हो सकता है। आरबीआई के अनुसार कमेटी ने एकमत से रेपो रेट में बदलाव न करने का फैसला किया है।

महंगाई पर राय
मानिटरिंग पॉलिटी कमेटी यानी एमपीसी के फैसलों की जानकारी देते हुए आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया कि सर्दियों में महंगाई दर में कमी आने की उम्मीद है। ऐसे में आरबीआई ने अपना रुख एकोमोडेटिव रखा है। उनके अनुसार एमपीसी के समक्ष महंगाई एक बड़ी चिंता है।
वित्तीय स्थिरता को प्राथमिकता
आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि वित्तीय क्षेत्र में स्थिरता पर काम जारी है। रिस्क मैनेजमेंट बैंकों की प्राथमिकता है। उनके अनुसार कोविड 19 से लड़ाई में देश निर्णायक मोड़ पर है। आर्थिक दिक्कतों पर समय से पहले फैसले लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाह में रिकवरी के साफ संकेत दिख रहे हैं।
सिस्टम में लिक्विडिटी की समस्या नहीं
उन्होंने कहा कि चौथी तिमाही में जीडीपी पॉजिटिव होने का अनुमान है। उनके अनुसार सिस्टम में पर्याप्त मात्रा में लिक्विडिटी मौजूद है। वहीं बीते 2 महीने में महंगाई अनुमान गलत साबित हुआ है। तीसरी तिमाही में सीपीआई को लेकर अनुमान है कि यह 6.8 फीसदी पर रह सकती है। राहत पैकेजों को लेकर उन्होंन कहा कि इससे मांग के साथ निवेश भी बढ़ेगा। आरबीआई का ध्यान ग्रोथ और स्थिरता पर है। वहीं उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2020 में बैंक डिविडेंड नहीं देंगे।
मॉनिटरी पॉलिसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का मतलब
रेपो रेट
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन वगैरह।
रिवर्स रेपो रेट
जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है. बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे।
सीआरआर
देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।
एसएलआर
जिस दर पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते है, उसे एसएलआर कहते हैं। नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। कमर्शियल बैंकों को एक खास रकम जमा करानी होती है जिसका इस्तेमाल किसी इमरजेंसी लेन-देन को पूरा करने में किया जाता है। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बगैर नकदी की तरलता कम करना चाहता है तो वह सीआरआर बढ़ा देता है, इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए कम रकम बचती है।
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